Hope Poetry (page 97)
क्या रौशनी-ए-हुस्न-ए-सबीह अंजुमन में है
बिशन नरायण दराबर
ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर
बिर्ज लाल रअना
दुनिया में वफ़ा-केश बशर ढूँढ रहा हूँ
बिर्ज लाल रअना
आप अपने रक़ीब हैं हम लोग
बिर्ज लाल रअना
जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था
बिमल कृष्ण अश्क
नज़्म
बिमल कृष्ण अश्क
तुझ जैसा इक आँचल चाहूँ अपने जैसा दामन ढूँडूँ
बिमल कृष्ण अश्क
जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था
बिमल कृष्ण अश्क
जब चौदहवीं का चाँद निकलता दिखाई दे
बिमल कृष्ण अश्क
यही इक मश्ग़ला शाम-ओ-सहर है
बिल्क़ीस बेगम
आँखों से कभी कूचा-ए-जानाँ नहीं देखा
बिल्क़ीस बेगम
तमाम लाला ओ गुल के चराग़ रौशन हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
हम तो बेगाने से ख़ुद को भी मिले हैं 'बिल्क़ीस'
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
ज़ख़्म को फूल कहें नौहे को नग़्मा समझें
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
मिरी हथेली में लिक्खा हुआ दिखाई दे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
किस ने कहा किसी का कहा तुम किया करो
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
कब इक मक़ाम पे रुकती है सर-फिरी है हवा
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
जीना है ख़ूब औरों की ख़ातिर जिया करो
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
एक आलम है ये हैरानी का जीना कैसा
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
देता था जो साया वो शजर काट रहा है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर
बिलाल अहमद
नास्टैल्जिया
बिलाल अहमद
ज़मीं नई थी अनासिर की ख़ू बदलती थी
बिलाल अहमद
तिरी तलाश में निकला तो रास्ता हुआ मैं
बिलाल अहमद
इक दिखावा रह गया बस दिल से वो चाहत गई
बिलाल अहमद
अजल की फूँक मिरे कान में सुनाई दी
बिलाल अहमद
कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
भवेश दिलशाद
रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी
भारतेंदु हरिश्चंद्र