Islamic Poetry (page 61)

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

अल्लामा इक़बाल

जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही

अल्लामा इक़बाल

इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी में ज़ेर-ओ-बम

अल्लामा इक़बाल

हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़

अल्लामा इक़बाल

फ़ितरत ने न बख़्शा मुझे अंदेशा-ए-चालाक

अल्लामा इक़बाल

एजाज़ है किसी का या गर्दिश-ए-ज़माना

अल्लामा इक़बाल

दिगर-गूँ है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी

अल्लामा इक़बाल

अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं

अल्लामा इक़बाल

अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा

अल्लामा इक़बाल

आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं

अल्लामा इक़बाल

यार के दरसन के ख़ातिर जान और तन भूल जा

अलीमुल्लाह

यार जब नैनों में आया हू-ब-हू

अलीमुल्लाह

तू है किस मंज़िल में तेरा बोल खाँ है दिल का ठार

अलीमुल्लाह

रक़ीब-ए-नफ़्स का मुख मोड़ता रह

अलीमुल्लाह

नूर-ए-हक़ बे-हिजाब इश्क़-अल्लाह

अलीमुल्लाह

मुर्ग़ ज़ीरक अक़्ल का है इश्क़ का सय्याद शोख़

अलीमुल्लाह

लगा कर इश्क़ का कजरा नयन को

अलीमुल्लाह

जब पियारा गिला सुनाता है

अलीमुल्लाह

इश्क़ आ हम सूँ किया जब राम राम

अलीमुल्लाह

इलाही बुलबुल-ए-गुलज़ार-मअनी कर लिसाँ मेरा

अलीमुल्लाह

हुस्न का देख हर तरफ़ गुलज़ार

अलीमुल्लाह

ग़फ़लत में सोया अब तिलक फिर होवेगा होश्यार कब

अलीमुल्लाह

दया साक़ी लबालब मुझ को साग़र

अलीमुल्लाह

'बहरी' पछाने नीं उसे गुल के सो वो दम-साज़ थे

अलीमुल्लाह

अक़्ल-ए-जुज़वी छोड़ कर ऐ यार फ़िक्र-ए-कुल करो

अलीमुल्लाह

अपने से बे-समझ को हक़ की कहाँ पछानत

अलीमुल्लाह

अजब चंचल मिला है यार हमना

अलीमुल्लाह

अबस क्यूँ उम्र सोने में गँवाया

अलीमुल्लाह

अब तलक हक़ नहिं पछाने वाह-वाह

अलीमुल्लाह

मस्लहत का कोई ख़ुदा है यहाँ

अली ज़ुबैर