Islamic Poetry (page 59)

वस्ल का उस के दिल-ए-ज़ार तमन्नाई है

अल्ताफ़ हुसैन हाली

उस के जाते ही ये क्या हो गई घर की सूरत

अल्ताफ़ हुसैन हाली

ख़ूबियाँ अपने में गो बे-इंतिहा पाते हैं हम

अल्ताफ़ हुसैन हाली

कर के बीमार दी दवा तू ने

अल्ताफ़ हुसैन हाली

कह दो कोई साक़ी से कि हम मरते हैं प्यासे

अल्ताफ़ हुसैन हाली

कब्क ओ क़ुमरी में है झगड़ा कि चमन किस का है

अल्ताफ़ हुसैन हाली

गुलों की गर इनायत हो गई तो

आलोक यादव

भरे जो ज़ख़्म तो दाग़ों से क्यूँ उलझें?

आलोक यादव

हम मुसलसल इक बयाँ देते हुए

आलोक मिश्रा

बुझती आँखों में तिरे ख़्वाब का बोसा रक्खा

आलोक मिश्रा

वो हर्फ़-ए-राज़ कि मुझ को सिखा गया है जुनूँ

अल्लामा इक़बाल

तेरा इमाम बे-हुज़ूर तेरी नमाज़ बे-सुरूर

अल्लामा इक़बाल

सौदा-गरी नहीं ये इबादत ख़ुदा की है

अल्लामा इक़बाल

मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया ताइब

अल्लामा इक़बाल

मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने

अल्लामा इक़बाल

मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा

अल्लामा इक़बाल

मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा

अल्लामा इक़बाल

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

अल्लामा इक़बाल

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

अल्लामा इक़बाल

हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी

अल्लामा इक़बाल

हरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एक

अल्लामा इक़बाल

गला तो घोंट दिया अहल-ए-मदरसा ने तिरा

अल्लामा इक़बाल

बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी

अल्लामा इक़बाल

आईन-ए-जवाँ-मर्दां हक़-गोई ओ बे-बाकी

अल्लामा इक़बाल

ज़ौक़ ओ शौक़

अल्लामा इक़बाल

तुलू-ए-इस्लाम

अल्लामा इक़बाल

तस्वीर-ए-दर्द

अल्लामा इक़बाल

तारिक़ की दुआ

अल्लामा इक़बाल

तराना-ए-मिल्ली

अल्लामा इक़बाल

शिकवा

अल्लामा इक़बाल