Love Poetry (page 117)
न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती
फ़ज़्ल ताबिश
एक नज़्म
फ़ज़्ल ताबिश
एक नज़्म
फ़ज़्ल ताबिश
उसे मालूम है मैं सर-फिरा हूँ
फ़ज़्ल ताबिश
न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती
फ़ज़्ल ताबिश
मिलों के शहर में घटता हुआ दिन सोचता होगा
फ़ज़्ल ताबिश
मैं उस के ख़्वाब में कब जा के देख पाया हूँ
फ़ज़्ल ताबिश
कली कली का बदन फोड़ कर जो निकला है
फ़ज़्ल ताबिश
हर इक दरवाज़ा मुझ पर बंद होता
फ़ज़्ल ताबिश
फ़रेब-ए-करम इक तो उन का है इस पर
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
अहल-ए-हुनर के दिल में धड़कते हैं सब के दिल
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
ज़िंदगी साज़-ए-शिकस्ता की फ़ुग़ाँ ही तो नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
तुम्हीं इक नहीं जाँ-सेताँ और भी हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
तामीर-ए-नौ क़ज़ा-ओ-क़दर की नज़र में है
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
कुछ तो मुझे महबूब तिरा ग़म भी बहुत है
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
ग़मों से खेलते रहना कोई हँसी भी नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
बहार आई गुल-अफ़्शानी के दिन हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
अस्बाब-ए-ज़िंदगी की हर इक चीज़ है गराँ
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
अब वो महकी हुई सी रात नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं
फ़ाज़िल जमीली
तुम कभी एक नज़र मेरी तरफ़ भी देखो
फ़ाज़िल जमीली
सफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है
फ़ाज़िल जमीली
सब अपने अपने दियों के असीर पाए गए
फ़ाज़िल जमीली
मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ
फ़ाज़िल जमीली
मैं अपने आप से आगे निकलने वाला था
फ़ाज़िल जमीली
इस कॉकटेल का तो नशा ही कुछ और है
फ़ाज़िल जमीली
सरहदें
फ़ाज़िल जमीली
दरख़्तों के लिए
फ़ाज़िल जमीली
शौक़ीन मिज़ाजों के रंगीन तबीअ'त के
फ़ाज़िल जमीली
सफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है
फ़ाज़िल जमीली