Love Poetry (page 116)
अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है
फ़िराक़ गोरखपुरी
अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है
फ़िराक़ गोरखपुरी
अब अक्सर चुप चुप से रहें हैं यूँही कभू लब खोलें हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
आँखों में जो बात हो गई है
फ़िराक़ गोरखपुरी
आज भी क़ाफ़िला-ए-इश्क़ रवाँ है कि जो था
फ़िराक़ गोरखपुरी
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
उन पे क़ुर्बान हर ख़ुशी कर दी
फ़िगार उन्नावी
क़दम क़दम पे दोनों जुर्म-ए-इश्क़ में शरीक हैं
फ़िगार उन्नावी
परतव-ए-हुस्न से ज़र्रे भी बने आईने
फ़िगार उन्नावी
काबा भी घर अपना है सनम-ख़ाना भी अपना
फ़िगार उन्नावी
हसरत-ए-दिल ना-मुकम्मल है किताब-ए-ज़िंदगी
फ़िगार उन्नावी
ग़म-ओ-अलम से जो ताबीर की ख़ुशी मैं ने
फ़िगार उन्नावी
एक ख़्वाब-ओ-ख़याल है दुनिया
फ़िगार उन्नावी
तुम हरीम-ए-नाज़ में बैठे हो बेगाने बने
फ़िगार उन्नावी
तूफ़ाँ से बच के दामन-ए-साहिल में रह गया
फ़िगार उन्नावी
शोहरत-ए-तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ आम हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
लब पे झूटे तराने होते हैं
फ़िगार उन्नावी
कुछ काम तो आया दिल-ए-नाकाम हमारा
फ़िगार उन्नावी
किसी अपने से होती है न बेगाने से होती है
फ़िगार उन्नावी
जुरअत-ए-इश्क़ हवस-कार हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
जफ़ा-ए-यार को हम लुत्फ़-ए-यार कहते हैं
फ़िगार उन्नावी
हस्ती इक नक़्श-ए-इनइकासी है
फ़िगार उन्नावी
हासिल-ए-ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ नाकाम है
फ़िगार उन्नावी
हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-शम्-ओ-परवाना नहीं कहते
फ़िगार उन्नावी
ग़म-ए-जानाँ से रंगीं और कोई ग़म नहीं होता
फ़िगार उन्नावी
चमन अपने रंग में मस्त है कोई ग़म-गुसार-ए-दिगर नहीं
फ़िगार उन्नावी
चला हूँ अपनी मंज़िल की तरफ़ तो शादमाँ हो कर
फ़िगार उन्नावी
आरज़ू हसरत-ए-नाकाम से आगे न बढ़ी
फ़िगार उन्नावी
तिरी जुस्तुजू में देखा मैं कहाँ कहाँ से गुज़रा
फ़िगार मुरादाबादी
ख़राब-हाल हूँ हर हाल में ख़राब रहा
फ़ज़लुर्रहमान