Love Poetry (page 137)
राख उड़ती हुई बालों में नज़र आती है
फ़रह इक़बाल
मुद्दतों हम से मुलाक़ात नहीं करते हैं
फ़रह इक़बाल
मोहब्बत का दिया ऐसे बुझा था
फ़रह इक़बाल
मिरे हम-रक़्स साए को बिल-आख़िर यूँही ढलना था
फ़रह इक़बाल
कोई जब मिल के मुस्कुराया था
फ़रह इक़बाल
कैसे मंज़र हैं जो इदराक में आ जाते हैं
फ़रह इक़बाल
कहीं यक़ीं से न हो जाएँ हम गुमाँ की तरह
फ़रह इक़बाल
कहें हम क्या किसी से दिल की वीरानी नहीं जाती
फ़रह इक़बाल
कभी तुम भीगने आना मिरी आँखों के मौसम में
फ़रह इक़बाल
हमें तो साथ चलने का हुनर अब तक नहीं आया
फ़रह इक़बाल
एक मुद्दत से यहाँ ठहरा हुआ पानी है
फ़रह इक़बाल
दर्द का समुंदर है सिर्फ़ पार होने तक
फ़रह इक़बाल
न जाने कैसा समुंदर है इश्क़ का जिस में
फ़राग़ रोहवी
न चाँद ने किया रौशन मुझे न सूरज ने
फ़राग़ रोहवी
हमारे तन पे कोई क़ीमती क़बा न सही
फ़राग़ रोहवी
दिमाग़ अहल-ए-मोहब्बत का साथ देता नहीं
फ़राग़ रोहवी
मैं एक बूँद समुंदर हुआ तो कैसे हुआ
फ़राग़ रोहवी
लबों के सामने ख़ाली गिलास रखते हैं
फ़राग़ रोहवी
कमी ज़रा सी अगर फ़ासले में आ जाए
फ़राग़ रोहवी
कभी यक़ीं से हुई और कभी गुमाँ से हुई
फ़राग़ रोहवी
कभी न सोचा था मैं ने उड़ान भरते हुए
फ़राग़ रोहवी
कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे
फ़राग़ रोहवी
जो भी अंजाम हो आग़ाज़ किए देते हैं
फ़राग़ रोहवी
जिस दिन से कोई ख़्वाहिश-ए-दुनिया नहीं रखता
फ़राग़ रोहवी
दिन में भी हसरत-ए-महताब लिए फिरते हैं
फ़राग़ रोहवी
फटी मश्कें लिए दिन-रात दरिया देखने वाले
फ़क़ीह हैदर
मैं ख़ुश हुआ कि बूद में रक्खा गया मुझे
फ़क़ीह हैदर
जिस्म में गूँजता है रूह पे लिक्खा दुख है
फ़क़ीह हैदर
हिज्र मैं जो ली गई तस्वीर है
फ़क़ीह हैदर
ज़िंदगी जब्र है और जब्र के आसार नहीं
फ़ानी बदायुनी