Love Poetry (page 217)

ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़िंदगी भर मैं खुली छत पे खड़ी भीगा की

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वफ़ा के नाम पर पैरा किए कच्चे घड़े ले कर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

उस की हर बात समझ कर भी मैं अंजान रही

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मुझे चखते ही खो बैठा वो जन्नत अपने ख़्वाबों की

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कोई मौसम मेरी उम्मीदों को रास आया नहीं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम ने सारा जीवन बाँटी प्यार की दौलत लोगों में

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम ऐसे सूरमा हैं लड़ के जब हालात से पलटे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

गए मौसम में मैं ने क्यूँ न काटी फ़स्ल ख़्वाबों की

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फ़साना-दर-फ़साना फिर रही है ज़िंदगी जब से

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

इक वही खोल सका सातवाँ दर मुझ पे मगर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़रा सी देर में वो जाने क्या से क्या कर दे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़रा मुश्किल से समझेंगे हमारे तर्जुमाँ हम को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो इक नज़र से मुझे बे-असास कर देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

तू आया तो द्वार भिड़े थे दीप बुझा था आँगन का

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

रूठ जाएगा तो मुझ से और क्या ले जाएगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

पड़ा है ज़िंदगी के इस सफ़र से साबिक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

निकलना ख़ुद से मुमकिन है न मुमकिन वापसी मेरी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लिया है किस क़दर सख़्ती से अपना इम्तिहाँ हम ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

किस क़दर कम-असास हैं कुछ लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ख़ुद में उतरूँगी तो मैं भी लापता हो जाऊँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा