Love Poetry (page 270)

मेरी पहली नज़्म

अनवर मसूद

उसे तो पास-ए-ख़ुलूस-ए-वफ़ा ज़रा भी नहीं

अनवर मसूद

तय हो गया है मसअला जब इंतिसाब का

अनवर मसूद

सोचना रूह में काँटे से बिछाए रखना

अनवर मसूद

शिकवा-ए-गर्दिश-ए-हालात लिए फिरता है

अनवर मसूद

रात आई है बलाओं से रिहाई देगी

अनवर मसूद

पढ़ने भी न पाए थे कि वो मिट भी गई थी

अनवर मसूद

पढ़ने भी न पाए थे कि वो मिट भी गई थी

अनवर मसूद

मेरी क़िस्मत कि वो अब हैं मिरे ग़म-ख़्वारों में

अनवर मसूद

मैं जुर्म-ए-ख़मोशी की सफ़ाई नहीं देता

अनवर मसूद

मैं देख भी न सका मेरे गिर्द क्या गया था

अनवर मसूद

जो बारिशों में जले तुंद आँधियों में जले

अनवर मसूद

इशारतों की वो शर्हें वो तज्ज़िया भी गया

अनवर मसूद

इस इब्तिदा की सलीक़े से इंतिहा करते

अनवर मसूद

बस यूँही इक वहम सा है वाक़िआ ऐसा नहीं

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

अगले दिन कुछ ऐसे होंगे

अनवर मसूद

मगर मेरी आँखों में

अनवर मक़सूद ज़ाहिदी

आग

अनवर मक़सूद ज़ाहिदी

उतरी शाम तो बरसा पानी या अल्लाह

अनवर ख़ान

सच ये है हम ही मोहब्बत का सबक़ पढ़ न सके

अनवर जमाल अनवर

कैसा मक़ाम आया मोहब्बत की राह में

अनवर जमाल अनवर

हुस्न ऐसा कि ज़माने में नहीं जिस की मिसाल

अनवर जमाल अनवर

ज़िंदगी अपनी ख़्वाब जैसी है

अनवर जमाल अनवर

ज़माना उफ़ ये कैसा हो रहा है

अनवर जमाल अनवर

रात का क्या ज़िक्र है शाम-ओ-सहर आया नहीं

अनवर जमाल अनवर

दर्द-ए-दिल की दवा है माह-ए-नौ

अनवर जमाल अनवर

चढ़ते तूफ़ान को साहिल से गुज़रना था मियाँ

अनवर जमाल अनवर

बे-घर था फिर छोड़ गया घर जाने क्यूँ

अनवर जमाल अनवर

आए हैं समझाने लोग

अनवर जमाल अनवर