Love Poetry (page 272)
कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया
अनवर अंजुम
हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा
अनवर अंजुम
धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे
अनवर अंजुम
चुप बैठा में अक्सर सोचता रहता हूँ
अनवर अंजुम
चाँद तारे जिसे हर शब देखें
अनवर अंजुम
नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है
अनवर अलीमी
ज़ख़्म-ए-नज़ारा ख़ून-ए-नज़र देखते रहो
अनवर मोअज़्ज़म
ये क़िस्सा-ए-ग़म-ए-दिल है तो बाँकपन से चले
अनवर मोअज़्ज़म
जब मिरी ज़ीस्त के उनवाँ नए मतलूब हुए
अनवर मोअज़्ज़म
हमें भूला नहीं अफ़्साना दिल का
अनवर मोअज़्ज़म
ग़म-ए-हबीब ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं होता
अनवर मोअज़्ज़म
दीदा-ए-तर ने अजब जल्वागरी देखी है
अनवर मोअज़्ज़म
आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ
अनवर मोअज़्ज़म
आज कुछ यूँ शब-ए-तन्हाई का अफ़्साना चले
अनवर मोअज़्ज़म
शहर-दर-शहर फ़ज़ाओं में धुआँ है अब के
अनवर महमूद खालिद
जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं
अनवर महमूद खालिद
जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं
अनवर महमूद खालिद
अन-कहे लफ़्ज़ों में मतलब ढूँढता रहता हूँ मैं
अनवर महमूद खालिद
अन-कहे लफ़्ज़ों का मतलब ढूँढता रहता हूँ मैं
अनवर महमूद खालिद
ये दिल ही जानता है फिर कहाँ कहाँ भटके
अनुभव गुप्ता
उसे यादों में जब लाना मुसलसल कर दिया मैं ने
अनुभव गुप्ता
सितम सहने की तय्यारी भी कोई चीज़ होती है
अनुभव गुप्ता
फ़ज़ा-ए-दिल में घनी तीरगी सी लगती है
अनुभव गुप्ता
दिल यही सोच के बेताब हुआ जाता है
अनुभव गुप्ता
जुर्म ठहरा हाल से आगे का नक़्शा देखना
अनसर अली अनसर
सच्चाई की ख़ुशबू की रमक़ तक न थी उन में
अंजुम तराज़ी
जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी
अंजुम तराज़ी
लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था
अंजुम तराज़ी
हर घर के मकीनों ने ही दर खोले हुए थे
अंजुम तराज़ी
क्या ख़बर थी कि तिरे साथ ये दुनिया होगी
अंजुम सिद्दीक़ी