Love Poetry (page 286)

यूँ तो बिखरे थे मगर कुछ तो कहीं पर कुछ था

आमिर नज़र

तअ'ल्लुक़ात के सारे दिए बुझे हुए थे

आमिर नज़र

शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं

आमिर नज़र

नुक़्ता-ए-बे-नूर ने मिनहाज-ए-इम्काँ कर दिया

आमिर नज़र

कुछ सुलगते हुए ख़्वाबों की फ़रावानी है

आमिर नज़र

खुला है तेरे बदन का भी इस्तिआरा कुछ

आमिर नज़र

ख़ेमा-ए-जाँ को जो देखूँ तो शरर-बार लगे

आमिर नज़र

ख़ामोशियों को आलम-ए-अस्वात पर कभी

आमिर नज़र

जो भी कुछ ताक़-ए-ख़यालात पे रह जाते हैं

आमिर नज़र

जबीं को चैन कहाँ ज़ेर-ए-लब दुआ है बस

आमिर नज़र

हम कि सरमाया-ए-ईक़ान लिए बैठे हैं

आमिर नज़र

हमारे चेहरों में पिन्हाँ हैं ज़ाविए क्या क्या

आमिर नज़र

फ़िशार-ए-तीरह-शबी से सहर निकल आए

आमिर नज़र

एक इक तार-ए-नफ़स आशुफ़्ता-ए-आहंग था

आमिर नज़र

दश्त के खेमा-ए-दरिया में मकीं कोई था

आमिर नज़र

दरपेश तो हैं दीदा-ए-हैरान हज़ारों

आमिर नज़र

बोसीदा सही ज़ेब-ए-क़बा तक नहीं आती

आमिर नज़र

इश्क़ से बाज़ आते हम दीवाने क्या

आमिर मौसवी

ए'तिबार-ए-शौक़ इक धोका सही

आमिर मौसवी

दिन को कह दें रात हम समझे नहीं

आमिर मौसवी

तेरी ख़ुशबू तिरा पैकर है मिरे शेरों में

अमीर हम्ज़ा साक़िब

तह कर चुके बिसात-ए-ग़म-ओ-फ़िक्र-ए-रोज़गार

अमीर हम्ज़ा साक़िब

मेरी दुनिया इसी दुनिया में कहीं रहती है

अमीर हम्ज़ा साक़िब

ख़बर भी है तुझे इस दफ़्तर-ए-मोहब्बत को

अमीर हम्ज़ा साक़िब

तेरी इनायतों का अजब रंग ढंग था

अमीर हम्ज़ा साक़िब

तिरे ख़याल के जब शामियाने लगते हैं

अमीर हम्ज़ा साक़िब

ताब खो बैठा हर इक जौहर-ए-ख़ाकी मेरा

अमीर हम्ज़ा साक़िब

सबा बनाते हैं ग़ुंचा-दहन बनाते हैं

अमीर हम्ज़ा साक़िब

निज़ाम-ए-बस्त-ओ-कुशाद-ए-मानी सँवारते हैं

अमीर हम्ज़ा साक़िब

मीरास-ए-बे-बहा भी बचाई न जा सकी

अमीर हम्ज़ा साक़िब