Love Poetry (page 344)

जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे

अहमद नदीम क़ासमी

जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी

अहमद नदीम क़ासमी

जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया

अहमद नदीम क़ासमी

हम उन के नक़्श-ए-क़दम ही को जादा करते रहे

अहमद नदीम क़ासमी

हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते

अहमद नदीम क़ासमी

हम दिन के पयामी हैं मगर कुश्ता-ए-शब हैं

अहमद नदीम क़ासमी

होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम

अहमद नदीम क़ासमी

हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है

अहमद नदीम क़ासमी

इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़-ओ-समा दे दूँगा

अहमद नदीम क़ासमी

एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का

अहमद नदीम क़ासमी

एहसास में फूल खिल रहे हैं

अहमद नदीम क़ासमी

दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई

अहमद नदीम क़ासमी

दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने

अहमद नदीम क़ासमी

बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था

अहमद नदीम क़ासमी

अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या

अहमद नदीम क़ासमी

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था

अहमद नदीम क़ासमी

अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था

अहमद नदीम क़ासमी

अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की

अहमद नदीम क़ासमी

ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता

अहमद मुश्ताक़

तमाशा-गाह-ए-जहाँ में मजाल-ए-दीद किसे

अहमद मुश्ताक़

रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए

अहमद मुश्ताक़

रोने लगता हूँ मोहब्बत में तो कहता है कोई

अहमद मुश्ताक़

पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है

अहमद मुश्ताक़

नए दीवानों को देखें तो ख़ुशी होती है

अहमद मुश्ताक़

मुझे मालूम है अहल-ए-वफ़ा पर क्या गुज़रती है

अहमद मुश्ताक़

मोहब्बत मर गई 'मुश्ताक़' लेकिन तुम न मानोगे

अहमद मुश्ताक़

मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में

अहमद मुश्ताक़

कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए

अहमद मुश्ताक़

जहान-ए-इश्क़ से हम सरसरी नहीं गुज़रे

अहमद मुश्ताक़