Love Poetry (page 367)
हिजरत
आफ़ताब शम्सी
टूटा हुआ आईना जो रस्ते में पड़ा था
आफ़ताब शम्सी
तलाश-ए-क़ाफ़िया में उम्र सब गुज़ारी है
आफ़ताब शम्सी
कोई अच्छी सी ग़ज़ल कानों में मेरे घोल दे
आफ़ताब शम्सी
जू-ए-रवाँ हूँ ठहरा समुंदर नहीं हूँ मैं
आफ़ताब शम्सी
मेरे गले से आन के प्यारा जो फिर लगे
आफ़ताब शाह आलम सानी
जब वो नज़रें दो-चार होती हैं
आफ़ताब शाह आलम सानी
गो सुध नहीं उस शोख़ सितमगर ने सँभाली
आफ़ताब शाह आलम सानी
देखो तो किस अदा से रुख़ पर हैं डाली ज़ुल्फ़ें
आफ़ताब शाह आलम सानी
इश्क़ में ये मजबूरी तो हो जाती है
आफ़ताब इक़बाल शमीम
दिल और दुनिया दोनों को ख़ुश रखने में
आफ़ताब इक़बाल शमीम
मुंकिर का ख़ौफ़
आफ़ताब इक़बाल शमीम
हिज्र-ज़ाद
आफ़ताब इक़बाल शमीम
दीवार-ए-चीन
आफ़ताब इक़बाल शमीम
ये पेड़ ये पहाड़ ज़मीं की उमंग हैं
आफ़ताब इक़बाल शमीम
ये जो ठहरा हुआ मंज़र है बदलता ही नहीं
आफ़ताब इक़बाल शमीम
वो अपने जुज़्व में खोया गया है इस हद तक
आफ़ताब इक़बाल शमीम
फिर बपा शहर में अफ़रातफ़री कर जाए
आफ़ताब इक़बाल शमीम
नज़र के सामने रहना नज़र नहीं आना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
मिसाल-ए-सैल-ए-बला न ठहरे हवा न ठहरे
आफ़ताब इक़बाल शमीम
मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
कभी ख़ुद को दर्द-शनास करो कभी आओ ना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
जब वो इक़रार-ए-आश्नाई करे
आफ़ताब इक़बाल शमीम
जब चाहा ख़ुद को शाद या नाशाद कर लिया
आफ़ताब इक़बाल शमीम
इश्क़ में ये मजबूरी तो हो जाती है
आफ़ताब इक़बाल शमीम
दिखाई जाएगी शहर-ए-शब में सहर की तमसील चल के देखें
आफ़ताब इक़बाल शमीम
असीर-ए-हाफ़िज़ा हो आज के जहान में आओ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
कुछ रब्त-ए-ख़ास अस्ल का ज़ाहिर के साथ है
आफ़ताब हुसैन
कुछ और तरह की मुश्किल में डालने के लिए
आफ़ताब हुसैन
हुस्न वालों में कोई ऐसा हो
आफ़ताब हुसैन