Love Poetry (page 54)

बसर हो यूँ कि हर इक दर्द हादिसा न लगे

हसन नईम

आरज़ू थी कि तिरा दहर भी शोहरा होवे

हसन नईम

आँखों से टपके ओस तो जाँ में नमी रहे

हसन नईम

आँखों में बस रहा है अदा के बग़ैर भी

हसन नईम

वो चाँद जो उतरा है किसी और के घर में

हसन नासिर

अब आइना भी मिज़ाजों की बात करता है

हसन नासिर

मंज़र में अगर कुछ भी दिखाई नहीं देगा

हसन नासिर

खुले दिलों से मिले फ़ासला भी रखते रहे

हसन नासिर

मौसम का ज़ुल्म सहते हैं किस ख़ामुशी के साथ

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

लोग सुब्ह ओ शाम की नैरंगियाँ देखा किए

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

कोई ग़मगीं कोई ख़ुश हो कर सदा देता रहा

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

इश्क़ को पास-ए-वफ़ा आज भी करते देखा

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

हर ज़ख़्म-ए-दिल से अंजुमन-आराई माँग लो

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

अहल-ए-हवस के हाथों न ये कारोबार हो

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

आइनों से पहले भी रस्म-ए-ख़ुद-नुमाई थी

हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

सर उठा कर न कभी देखा कहाँ बैठे थे

हसन कमाल

सब की बिगड़ी को बनाने निकले

हसन कमाल

कल ख़्वाब में देखा सखी मैं ने पिया का गाँव रे

हसन कमाल

इनायत कम मोहब्बत कम वफ़ा कम

हसन कमाल

दिल लुटेगा जहाँ ख़फ़ा होगा

हसन कमाल

बिसात दिल की भला क्या निगाह-ए-यार में है

हसन कमाल

अपनी वज्ह-ए-बर्बादी जानते हैं हम लेकिन क्या करें बयाँ लोगो

हसन कमाल

ज़िंदगी भर दर-ओ-दीवार सजाए जाएँ

हसन जमील

'हसन-जमील' तिरा घर अगर ज़मीन पे है

हसन जमील

अभी वो ख़ुद को ही देखे जाता है आइने में

हसन जमील

तिरी जुदाई ने ये क्या बना दिया है मुझे

हसन जमील

नज़र में मंज़र-ए-रफ़्ता समा भी सकता है

हसन जमील

कोई दानाइयों को हेच जाने

हसन जमील

तारीख़ की अदालत

हसन हमीदी

उल्फ़त हो किसी की न मोहब्बत हो किसी की

हसन बरेलवी