Sad Poetry (page 15)
वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम
इंशा अल्लाह ख़ान
उस बंदा की चाह देखिएगा
इंशा अल्लाह ख़ान
टुक इक ऐ नसीम सँभाल ले कि बहार मस्त-ए-शराब है
इंशा अल्लाह ख़ान
टुक आँख मिलाते ही किया काम हमारा
इंशा अल्लाह ख़ान
तू ने लगाई अब की ये क्या आग ऐ बसंत
इंशा अल्लाह ख़ान
तफ़ज़्जुलात नहीं लुत्फ़ की निगाह नहीं
इंशा अल्लाह ख़ान
तब से आशिक़ हैं हम ऐ तिफ़्ल-ए-परी-वश तेरे
इंशा अल्लाह ख़ान
शब ख़्वाब में देखा था मजनूँ को कहीं अपने
इंशा अल्लाह ख़ान
सद-बर्ग गह दिखाई है गह अर्ग़वाँ बसंत
इंशा अल्लाह ख़ान
नींद मस्तों को कहाँ और किधर का तकिया
इंशा अल्लाह ख़ान
न तो काम रखिए शिकार से न तो दिल लगाइए सैर से
इंशा अल्लाह ख़ान
मुझे क्यूँ न आवे साक़ी नज़र आफ़्ताब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान
मियाँ चश्म-ए-जादू पे इतना घमंड
इंशा अल्लाह ख़ान
मिल गए पर हिजाब बाक़ी है
इंशा अल्लाह ख़ान
मल ख़ून-ए-जिगर मेरा हाथों से हिना समझे
इंशा अल्लाह ख़ान
लो फ़क़ीरों की दुआ हर तरह आबाद रहो
इंशा अल्लाह ख़ान
लग जा तू मिरे सीना से दरवाज़ा को कर बंद
इंशा अल्लाह ख़ान
किनाया और ढब का इस मिरी मज्लिस में कम कीजे
इंशा अल्लाह ख़ान
जो बात तुझ से चाही है अपना मिज़ाज आज
इंशा अल्लाह ख़ान
जी चाहता है शैख़ की पगड़ी उतारिए
इंशा अल्लाह ख़ान
जाड़े में क्या मज़ा हो वो तो सिमट रहे हों
इंशा अल्लाह ख़ान
जब तक कि ख़ूब वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहाँ न हूँ
इंशा अल्लाह ख़ान
है तिरा गाल माल बोसे का
इंशा अल्लाह ख़ान
है मुझ को रब्त बस-कि ग़ज़ालान-ए-रम के साथ
इंशा अल्लाह ख़ान
है जिस में क़ुफ़्ल-ए-ख़ाना-ए-ख़ुम्मार तोड़िए
इंशा अल्लाह ख़ान
गली से तेरी जो टुक हो के आदमी निकले
इंशा अल्लाह ख़ान
गाली सही अदा सही चीन-ए-जबीं सही
इंशा अल्लाह ख़ान
गाहे गाहे जो इधर आप करम करते हैं
इंशा अल्लाह ख़ान
दीवार फाँदने में देखोगे काम मेरा
इंशा अल्लाह ख़ान
दिल-ए-सितम-ज़दा बेताबियों ने लूट लिया
इंशा अल्लाह ख़ान