Sad Poetry (page 206)

रहगुज़ारों में रौशनी के लिए

अय्यूब रूमानी

दिल में कुछ दर्द सिवा है यारो

अय्यूब रूमानी

मोहब्बत का एक साल

अय्यूब ख़ावर

कुछ और हो भी तो राएगाँ है

अय्यूब ख़ावर

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

अय्यूब ख़ावर

तिलिस्म-ए-इस्म-ए-मोहब्बत है दरपय-ए-दर-ए-दिल

अय्यूब ख़ावर

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम

अय्यूब ख़ावर

सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

कोई न देखे गूँज हवा की

अय्यूब ख़ावर

इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते

अय्यूब ख़ावर

हवा के रुख़ पे रह-ए-ए'तिबार में रक्खा

अय्यूब ख़ावर

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

घर दरवाज़े से दूरी पर सात समुंदर बीच

अय्यूब ख़ावर

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

चराग़-ए-क़ुर्ब की लौ से पिघल गया वो भी

अय्यूब ख़ावर

बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना

अय्यूब ख़ावर

बर्ग-ए-गुल शाख़-ए-हिज्र का कर दे

अय्यूब ख़ावर

अब तो आए नज़र में जो भी हो

अय्यूब ख़ावर

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

अय्यूब ख़ावर

आ जाए न रात कश्तियों में

अय्यूब ख़ावर

उस ने हमारे हाथ में इक हाथ क्या दिया

आएशा मसूद मलिक

यूँ भी मिली है मुझ को मिरे ज़ब्त-ए-ग़म की दाद

अयाज़ झाँसवी

दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं

अयाज़ झाँसवी

ये बातों ही बातों में बातें बदलना

औरंगज़ेब

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है

औरंगज़ेब

ख़ुश बहुत आते हैं मुझ को रास्ते दुश्वार से

औरंगज़ेब

इश्क़ से मैं डर चुका था डर चुका तो तुम मिले

औरंगज़ेब