Sad Poetry (page 205)
तुम्हारे पास रहें हम तो मौत भी क्या है
आज़ाद गुलाटी
सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था
आज़ाद गुलाटी
सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था
आज़ाद गुलाटी
साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए
आज़ाद गुलाटी
रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया
आज़ाद गुलाटी
फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में
आज़ाद गुलाटी
मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ
आज़ाद गुलाटी
मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ
आज़ाद गुलाटी
लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई
आज़ाद गुलाटी
किस ने सदा दी कौन आया है
आज़ाद गुलाटी
ख़ुद हमीं को राहतों के कैफ़ का चसका न था
आज़ाद गुलाटी
कर्ब हरे मौसम का तब तक सहना पड़ता है
आज़ाद गुलाटी
कभी मिली जो तिरे दर्द की नवा मुझ को
आज़ाद गुलाटी
जो ग़म में जलते रहे उम्र-भर दिया बन कर
आज़ाद गुलाटी
हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ
आज़ाद गुलाटी
हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था
आज़ाद गुलाटी
गो मिरा साथ मिरी अपनी नज़र ने न दिया
आज़ाद गुलाटी
एक हंगामा बपा है मुझ में
आज़ाद गुलाटी
डूब कर ख़ुद में कभी यूँ बे-कराँ हो जाऊँगा
आज़ाद गुलाटी
दिन में इस तरह मिरे दिल में समाया सूरज
आज़ाद गुलाटी
अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया
आज़ाद गुलाटी
आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए
आज़ाद गुलाटी
अफ़्सोस बे-शुमार सुख़न-हा-ए-ग़ुफतनी
आज़ाद अंसारी
सितम-दोस्त फ़िक्र-ए-अदावत कहाँ तक
आज़ाद अंसारी
रूह ज़ख़्मी है जिस्म घायल है
आयुष चराग़
इबारतें चमक रही हैं दिल में तेरे प्यार की
आयुष चराग़
दिल ने खुलने की राह ले ली है
आयुष चराग़
शफ़क़ हूँ सूरज हूँ रौशनी हूँ
अय्यूब साबिर
मता-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र रहा हूँ
अय्यूब साबिर
साँस लेता हूँ तो दम घुटता है
अय्यूब रूमानी