Sad Poetry (page 203)
आज निकले याद की ज़म्बील से
अज़हर अदीब
सुब्ह कैसी है वहाँ शाम की रंगत क्या है
अज़हर अदीब
क़ज़ा का तीर था कोई कमान से निकल गया
अज़हर अदीब
कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख
अज़हर अदीब
जगह फूलों की रखते हैं घना साया बनाते हैं
अज़हर अदीब
घनेरी छाँव के सपने बहुत दिखाए गए
अज़हर अदीब
दर-ओ-दीवार से डर लग रहा था
अज़हर अदीब
दरीचों में चराग़ों की कमी महसूस होती है
अज़हर अदीब
दर टूटने लगे कभी दीवार गिर पड़े
अज़हर अदीब
अपना जैसा भी हाल रक्खा है
अज़हर अदीब
ये रात आख़िरी लोरी सुनाने वाली है
अज़हर अब्बास
पंछियों की किसी क़तार के साथ
अज़हर अब्बास
मिरी कहानी तिरी कहानी से मुख़्तलिफ़ है
अज़हर अब्बास
किस ने कहा कि चुप हूँ मियाँ बोलता नहीं
अज़हर अब्बास
जब तिरे ख़्वाब से बेदार हुआ करते थे
अज़हर अब्बास
देख क़िंदील रुख़-ए-यार की जानिब मत देख
अज़हर अब्बास
अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं
अज़हर अब्बास
सुब्ह आती है तो अख़बार से लग जाते हैं
अज़ीज़ परीहारी
मैं सोचता हूँ सबक़ मैं ने वो पढ़ा ही नहीं
अज़ीज़ परीहारी
ख़ुद से अब मुझ को जुदा यूँ ही मिरी जाँ रखना
अज़ीज़ परीहारी
खिड़कियाँ खोल के कैसी ये सदाएँ आईं
अज़ीज़ परीहारी
बक़ा-ए-दवाम का मुसाफ़िर
अज़ीम कुरेशी
वो शोख़ दिल-ओ-जाँ की तमन्ना तो न निकला
अज़ीम कुरेशी
सुरूर-ए-इश्क़ की मस्ती कहाँ है सब के लिए
अज़ीम कुरेशी
सहरा का कोई फूल मोअ'त्तर तो नहीं था
अज़ीम कुरेशी
कर्ब-ए-हिज्राँ ज़ि-बस है क्या कीजे
अज़ीम कुरेशी
इश्क़ अपना अजब तमाशा है
अज़ीम कुरेशी
बीच दिलों में उतरा तो है
अज़ीम कुरेशी
कुछ नक़्श तिरी याद के बाक़ी हैं अभी तक
अज़ीम मुर्तज़ा
हम दर्द के मारे ही गिराँ-जाँ हैं वगर्ना
अज़ीम मुर्तज़ा