Sad Poetry (page 201)
अफ़्सुर्दगी-ए-दर्द-ए-फ़राक़त है सहर तक
अज़हर नक़वी
मिरी दुनिया अकेली हो रही है
अज़हर नैयर
मैं महल रेत के सहरा में बनाने बैठा
अज़हर नैयर
मैं अपने शहर में अपना ही चेहरा खो बैठा
अज़हर नैयर
जी रहा हूँ मैं उदासी भरी तस्वीर के साथ
अज़हर नैयर
इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है
अज़हर नैयर
हुरूफ़ ख़ाली सदफ़ और निसाब ज़ख़्मों के
अज़हर नैयर
हरे दरख़्त का शाख़ों से रिश्ता टूट गया
अज़हर नैयर
हर एक राह में इम्कान-ए-हादिसा है अभी
अज़हर नैयर
हमारे चेहरे पे रंज-ओ-मलाल ऐसा था
अज़हर नैयर
हैरान हूँ कि आज ये क्या हादिसा हुआ
अज़हर नैयर
दरीचे सो गए शब जागती है
अज़हर नैयर
देखिए चलता है पैमाना किधर से पहले
अज़हर लखनवी
तू भी वफ़ा के रूप में अब ढल के देख ले
अज़हर जावेद
हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है
अज़हर इक़बाल
ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से
अज़हर इक़बाल
वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया
अज़हर इक़बाल
तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या
अज़हर इक़बाल
हुई न ख़त्म तेरी रहगुज़ार क्या करते
अज़हर इक़बाल
इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा
अज़हर इनायती
घर से किस तरह मैं निकलूँ कि ये मद्धम सा चराग़
अज़हर इनायती
वो मुझ से मेरा तआ'रुफ़ कराने आया था
अज़हर इनायती
वो मेरा यार था मुझ को न ये ख़याल आया
अज़हर इनायती
उजाला दश्त-ए-जुनूँ में बढ़ाना पड़ता है
अज़हर इनायती
उदास उदास तबीअ'त जो थी बहलने लगी
अज़हर इनायती
रंगतें मासूम चेहरों की बुझा दी जाएँगी
अज़हर इनायती
क़यामत आएगी माना ये हादिसा होगा
अज़हर इनायती
मैं समुंदर था मुझे चैन से रहने न दिया
अज़हर इनायती
कुछ आरज़ी उजाले बचाए हुए हैं लोग
अज़हर इनायती
ख़त उस के अपने हाथ का आता नहीं कोई
अज़हर इनायती