Sad Poetry (page 199)
करम का और है इम्काँ खुले तो बात चले
अज़ीज़ हामिद मदनी
जूयान-ए-ताज़ा-कारी-ए-गुफ़्तार कुछ कहो
अज़ीज़ हामिद मदनी
जी-दारो! दोज़ख़ की हवा में किस की मोहब्बत जलती है
अज़ीज़ हामिद मदनी
हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना
अज़ीज़ हामिद मदनी
हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को
अज़ीज़ हामिद मदनी
हरम का आईना बरसों से धुँदला भी है हैराँ भी
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़लत-बयाँ ये फ़ज़ा महर ओ कीं दरोग़ दरोग़
अज़ीज़ हामिद मदनी
फ़िराक़ से भी गए हम विसाल से भी गए
अज़ीज़ हामिद मदनी
एक-आध हरीफ़-ए-ग़म-ए-दुनिया भी नहीं था
अज़ीज़ हामिद मदनी
एक ही शहर में रहते बस्ते काले कोसों दूर रहा
अज़ीज़ हामिद मदनी
बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
ऐ शहर-ए-ख़िरद की ताज़ा हवा वहशत का कोई इनआम चले
अज़ीज़ हामिद मदनी
आतिश-ए-मीना नज़र आई हरीफ़ाना मुझे
अज़ीज़ हामिद मदनी
आज मुक़ाबला है सख़्त मीर-ए-सिपाह के लिए
अज़ीज़ हामिद मदनी
उमीद
अज़ीज़ फ़ैसल
हर एक के चेहरे पे है तशवीश नुमायाँ
अज़ीज़ एजाज़
जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर
अज़ीज़ एजाज़
उम्र भर रास्ते घेरे रहे उस शख़्स का घर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं जब भी उस की उदासी से ऊब जाऊँगी
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
हम से ज़ियादा कौन समझता है ग़म की गहराई को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
वो इक नज़र से मुझे बे-असास कर देगा
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
तू आया तो द्वार भिड़े थे दीप बुझा था आँगन का
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
फूँक देंगे मिरे अंदर के उजाले मुझ को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
न याद आया न भूला न सानेहा मुझ को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मेरा भी हर अंग था बहरा उस का जिस्म भी गूँगा था
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं उस की बात के लहजे का ए'तिबार करूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
किस क़दर कम-असास हैं कुछ लोग
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
आप भी रेत का मल्बूस पहन कर देखें
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
फूल जो दिल की रहगुज़र में है
अज़ीज़ अन्सारी