Sad Poetry (page 198)
आँखों में तिरी शक्ल है दिल में है तिरी याद
अज़ीज़ हैदराबादी
ज़ालिम तिरे वादों ने दीवाना बना रक्खा
अज़ीज़ हैदराबादी
वहशत-ए-दिल का अजब रंग नज़र आता है
अज़ीज़ हैदराबादी
उठाईं हिज्र की शब दिल ने आफ़तें क्या क्या
अज़ीज़ हैदराबादी
नाज़नीनान-ए-जहाँ शोबदा-गर पक्के हैं
अज़ीज़ हैदराबादी
नारा-ए-तकबीर भी ज़ाहिद निसार-ए-नग़मा है
अज़ीज़ हैदराबादी
नाले दम लेते नहीं या-रब फ़ुग़ाँ रुकती नहीं
अज़ीज़ हैदराबादी
न बदलना था न बदला दिल-ए-शैदा अपना
अज़ीज़ हैदराबादी
क्यूँ ख़फ़ा हो क्यूँ इधर आते नहीं
अज़ीज़ हैदराबादी
जफ़ा देखनी थी सितम देखना था
अज़ीज़ हैदराबादी
इन की ठोकर में शरारत होगी
अज़ीज़ हैदराबादी
दर्द जाता नज़र नहीं आता
अज़ीज़ हैदराबादी
बढ़ गईं गुस्ताख़ियाँ मेरी सज़ा के साथ साथ
अज़ीज़ हैदराबादी
मेरी वफ़ा है उस की उदासी का एक बाब
अज़ीज़ हामिद मदनी
कुछ अब के हम भी कहें उस की दास्तान-ए-विसाल
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़म-ए-हयात ओ ग़म-ए-दोस्त की कशाकश में
अज़ीज़ हामिद मदनी
ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब
अज़ीज़ हामिद मदनी
ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ
अज़ीज़ हामिद मदनी
वो साअ'त सूरत-ए-चक़माक़ जिस से लौ निकलती है
अज़ीज़ हामिद मदनी
वो एक रौ जो लब-ए-नुक्ता-चीं में होती है
अज़ीज़ हामिद मदनी
वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई
अज़ीज़ हामिद मदनी
ताज़ा हवा बहार की दिल का मलाल ले गई
अज़ीज़ हामिद मदनी
सँभल न पाए तो तक़्सीर-ए-वाक़ई भी नहीं
अज़ीज़ हामिद मदनी
सब पेच-ओ-ताब-ए-शौक़ के तूफ़ान थम गए
अज़ीज़ हामिद मदनी
नक़्शे उसी के दिल में हैं अब तक खिंचे हुए
अज़ीज़ हामिद मदनी
न फ़ासले कोई निकले न क़ुर्बतें निकलीं
अज़ीज़ हामिद मदनी
मिरी आँखें गवाह-ए-तल'अत-ए-आतिश हुईं जल कर
अज़ीज़ हामिद मदनी
लिखी हुई जो तबाही है उस से क्या जाता
अज़ीज़ हामिद मदनी
क्या हुए बाद-ए-बयाबाँ के पुकारे हुए लोग
अज़ीज़ हामिद मदनी
ख़त्म हुई शब-ए-वफ़ा ख़्वाब के सिलसिले गए
अज़ीज़ हामिद मदनी