Sad Poetry (page 207)
इश्क़ क्या है बेबसी है बेबसी की बात कर
औरंगज़ेब
हवस ने मुझ से पूछा था तुम्हारा क्या इरादा है
औरंगज़ेब
अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया
औरंगज़ेब
अब कोई और मुसीबत तो न पाली जाए
औरंगज़ेब
आम रस्ते से हट के आया हूँ
औरंगज़ेब
आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक
औरंगज़ेब
आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है
औरंगज़ेब
आइने से गुज़रने वाला था
औरंगज़ेब
आइना है ख़याल की हैरत
औरंगज़ेब
आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर
औरंगज़ेब
उभरते चाँद सितारों का तज़्किरा भी करो
औलाद अली रिज़वी
शिकस्ता-दिल की ख़ुशी दोस्तो ख़ुशी तो न थी
औलाद अली रिज़वी
न पूछो कैसे शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है
औलाद अली रिज़वी
न जिस का कोई सहारा हो वो किधर जाए
औलाद अली रिज़वी
ख़दशे थे शाम-ए-हिज्र के सुब्ह-ए-ख़ुशी के साथ
औलाद अली रिज़वी
गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे
औलाद अली रिज़वी
अपने सूखे हुए गुल-दान का ग़म है मुझ को
अतीक़ुल्लाह
वो
अतीक़ुल्लाह
कितना मुश्किल है
अतीक़ुल्लाह
वो तवानाई कहाँ जो कल तलक आज़ा में थी
अतीक़ुल्लाह
वो मेरे नाले का शोर ही था शब-ए-सियह की निहायतों में
अतीक़ुल्लाह
तू भी तो एक लफ़्ज़ है इक दिन मिरे बयाँ में आ
अतीक़ुल्लाह
मुझ से बे-ज़ारो न यूँ संग से मारो मुझ को
अतीक़ुल्लाह
मिरे सुपुर्द कहाँ वो ख़ज़ाना करता था
अतीक़ुल्लाह
मैं जो ठहरा ठहरता चला जाऊँगा
अतीक़ुल्लाह
क्या तुम ने कभी ज़िंदगी करते हुए देखा
अतीक़ुल्लाह
जब भी तन्हाई के एहसास से घबराता हूँ
अतीक़ुल्लाह
इस दश्त नवर्दी में जीना बहुत आसाँ था
अतीक़ुल्लाह
गरचे मैं सर से पैर तलक नोक-ए-संग था
अतीक़ुल्लाह
दिल के नज़दीक तो साया भी नहीं है कोई
अतीक़ुल्लाह