Sad Poetry (page 315)
मिल ही आते हैं उसे ऐसा भी क्या हो जाएगा
अहमद मुश्ताक़
मलाल-ए-दिल से इलाज-ए-ग़म-ए-ज़माना किया
अहमद मुश्ताक़
किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता
अहमद मुश्ताक़
किस रक़्स-ए-जान-आे-तन में मिरा दिल नहीं रहा
अहमद मुश्ताक़
किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए
अहमद मुश्ताक़
ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं
अहमद मुश्ताक़
ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं
अहमद मुश्ताक़
ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना
अहमद मुश्ताक़
कैसे उन्हें भुलाऊँ मोहब्बत जिन्हों ने की
अहमद मुश्ताक़
कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी
अहमद मुश्ताक़
कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है
अहमद मुश्ताक़
कभी ख़्वाहिश न हुई अंजुमन-आराई की
अहमद मुश्ताक़
इश्क़ में कौन बता सकता है
अहमद मुश्ताक़
इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम
अहमद मुश्ताक़
हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को
अहमद मुश्ताक़
हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं
अहमद मुश्ताक़
इक उम्र की और ज़रूरत है वही शाम-ओ-सहर करने के लिए
अहमद मुश्ताक़
इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी
अहमद मुश्ताक़
दिलों की ओर धुआँ सा दिखाई देता है
अहमद मुश्ताक़
दिल में वो शोर न आँखों में वो नम रहता है
अहमद मुश्ताक़
दस्त-ए-सुमूम दस्त-ए-सबा क्यूँ नहीं हुआ
अहमद मुश्ताक़
छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से
अहमद मुश्ताक़
छट गया अब्र शफ़क़ खुल गई तारे निकले
अहमद मुश्ताक़
चश्म ओ लब कैसे हों रुख़्सार हों कैसे तेरे
अहमद मुश्ताक़
चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया
अहमद मुश्ताक़
चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले
अहमद मुश्ताक़
चमक-दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय
अहमद मुश्ताक़
भूले-बिसरे मौसमों के दरमियाँ रहता हूँ मैं
अहमद मुश्ताक़
बरस कर खुल गया अब्र-ए-ख़िज़ाँ आहिस्ता आहिस्ता
अहमद मुश्ताक़
बहता आँसू एक झलक में कितने रूप दिखाएगा
अहमद मुश्ताक़