Sad Poetry (page 313)
फिर भयानक तीरगी में आ गए
अहमद नदीम क़ासमी
मुदावा हब्स का होने लगा आहिस्ता आहिस्ता
अहमद नदीम क़ासमी
मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ
अहमद नदीम क़ासमी
मैं वो शाएर हूँ जो शाहों का सना-ख़्वाँ न हुआ
अहमद नदीम क़ासमी
मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता
अहमद नदीम क़ासमी
मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे
अहमद नदीम क़ासमी
लब-ए-ख़ामोश से इफ़्शा होगा
अहमद नदीम क़ासमी
खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए
अहमद नदीम क़ासमी
कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
अहमद नदीम क़ासमी
जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे
अहमद नदीम क़ासमी
जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ
अहमद नदीम क़ासमी
जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया
अहमद नदीम क़ासमी
हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते
अहमद नदीम क़ासमी
होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम
अहमद नदीम क़ासमी
हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है
अहमद नदीम क़ासमी
फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो
अहमद नदीम क़ासमी
इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़-ओ-समा दे दूँगा
अहमद नदीम क़ासमी
एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का
अहमद नदीम क़ासमी
एहसास में फूल खिल रहे हैं
अहमद नदीम क़ासमी
दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई
अहमद नदीम क़ासमी
बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था
अहमद नदीम क़ासमी
अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या
अहमद नदीम क़ासमी
अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था
अहमद नदीम क़ासमी
अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था
अहमद नदीम क़ासमी
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
अहमद नदीम क़ासमी
ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता
अहमद मुश्ताक़
ये तन्हा रात ये गहरी फ़ज़ाएँ
अहमद मुश्ताक़
यही दुनिया थी मगर आज भी यूँ लगता है
अहमद मुश्ताक़
उम्र भर दुख सहते सहते आख़िर इतना तो हुआ
अहमद मुश्ताक़
तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
अहमद मुश्ताक़