Sad Poetry (page 314)
मिलने की ये कौन घड़ी थी
अहमद मुश्ताक़
मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में
अहमद मुश्ताक़
कैसे आ सकती है ऐसी दिल-नशीं दुनिया को मौत
अहमद मुश्ताक़
जो मुक़द्दर था उसे तो रोकना बस में न था
अहमद मुश्ताक़
हिज्र इक वक़्फ़ा-ए-बेदार है दो नींदों में
अहमद मुश्ताक़
चुप कहीं और लिए फिरती थी बातें कहीं और
अहमद मुश्ताक़
चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले
अहमद मुश्ताक़
भूल गई वो शक्ल भी आख़िर
अहमद मुश्ताक़
अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है
अहमद मुश्ताक़
ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे
अहमद मुश्ताक़
ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है
अहमद मुश्ताक़
ये तन्हा रात ये गहरी फ़ज़ाएँ
अहमद मुश्ताक़
ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब
अहमद मुश्ताक़
ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को
अहमद मुश्ताक़
ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं
अहमद मुश्ताक़
उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी
अहमद मुश्ताक़
उदास कर के दरीचे नए मकानों के
अहमद मुश्ताक़
तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ
अहमद मुश्ताक़
थम गया दर्द उजाला हुआ तन्हाई में
अहमद मुश्ताक़
शाम-ए-ग़म याद है कब शम्अ' जली याद नहीं
अहमद मुश्ताक़
शाम होती है तो याद आती है सारी बातें
अहमद मुश्ताक़
शबनम को रेत फूल को काँटा बना दिया
अहमद मुश्ताक़
सफ़र नया था न कोई नया मुसाफ़िर था
अहमद मुश्ताक़
रुख़्सत-ए-शब का समाँ पहले कभी देखा न था
अहमद मुश्ताक़
रौशनी रहती थी दिल में ज़ख़्म जब तक ताज़ा था
अहमद मुश्ताक़
रात फिर रंग पे थी उस के बदन की ख़ुशबू
अहमद मुश्ताक़
पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है
अहमद मुश्ताक़
नाला-ए-ख़ूनीं से रौशन दर्द की रातें करो
अहमद मुश्ताक़
मुसलसल याद आती है चमक चश्म-ए-ग़ज़ालाँ की
अहमद मुश्ताक़
मोनिस-ए-दिल कोई नग़्मा कोई तहरीर नहीं
अहमद मुश्ताक़