Sad Poetry (page 316)
अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा
अहमद मुश्ताक़
अजब नहीं कभी नग़्मा बने फ़ुग़ाँ मेरी
अहमद मुश्ताक़
अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं
अहमद मुश्ताक़
अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए
अहमद मुश्ताक़
अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए
अहमद मुश्ताक़
अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम
अहमद मुश्ताक़
आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना
अहमद मुश्ताक़
दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार
अहमद मासूम
ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास
अहमद महफ़ूज़
तारीकी के रात अज़ाब ही क्या कम थे
अहमद महफ़ूज़
हम को आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब
अहमद महफ़ूज़
ज़ख़्म खाना ही जब मुक़द्दर हो
अहमद महफ़ूज़
यूँ ही कब तक ऊपर ऊपर देखा जाए
अहमद महफ़ूज़
ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास
अहमद महफ़ूज़
उस से रिश्ता है अभी तक मेरा
अहमद महफ़ूज़
उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है
अहमद महफ़ूज़
रक़्स-ए-शरर क्या अब के वहशत-नाक हुआ
अहमद महफ़ूज़
नहीं आसमाँ तिरी चाल में नहीं आऊँगा
अहमद महफ़ूज़
मैं बंद आँखों से कब तलक ये ग़ुबार देखूँ
अहमद महफ़ूज़
लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का
अहमद महफ़ूज़
किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए
अहमद महफ़ूज़
छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ
अहमद महफ़ूज़
बदन-सराब न दरिया-ए-जाँ से मिलता है
अहमद महफ़ूज़
सुकूत तोड़ने का एहतिमाम करना चाहिए
अहमद ख़याल
कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर
अहमद ख़याल
कोई हैरत है न इस बात का रोना है हमें
अहमद ख़याल
दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया
अहमद ख़याल
ज़िंदगी ख़ौफ़ से तश्कील नहीं करनी मुझे
अहमद ख़याल
उन को में कर्बला के महीने में लाऊँगा
अहमद ख़याल
सुकूत तोड़ने का एहतिमाम करना चाहिए
अहमद ख़याल