Sad Poetry (page 317)
मिरे अंदर रवानी ख़त्म होती जा रही है
अहमद ख़याल
मैं वहशत-ओ-जुनूँ में तमाशा नहीं बना
अहमद ख़याल
कोई हैरत है न इस बात का रोना है हमें
अहमद ख़याल
कोई अन-देखी फ़ज़ा तस्वीर करना चाहिए
अहमद ख़याल
कल रात इक अजीब पहेली हुई हवा
अहमद ख़याल
जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया
अहमद ख़याल
जो तिरे ग़म की गिरानी से निकल सकता है
अहमद ख़याल
फ़ना के दश्त में कब का उतर गया था मैं
अहमद ख़याल
फ़लक के रंग ज़मीं पर उतारता हुआ मैं
अहमद ख़याल
दश्त ओ जुनूँ का सिलसिला मेरे लहू में आ गया
अहमद ख़याल
दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया
अहमद ख़याल
दरिया में दश्त दश्त में दरिया सराब है
अहमद ख़याल
बस्ती से चंद रोज़ किनारा करूँगा मैं
अहमद ख़याल
ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक
अहमद ख़याल
कुर्रा-ए-हिज्र से होना है नुमूदार मुझे
अहमद कामरान
ज़िंदा रहने का तक़ाज़ा नहीं छोड़ा जाता
अहमद कामरान
तुम्हारे हिज्र को काफ़ी नहीं समझता मैं
अहमद कामरान
मिट्टी से बग़ावत न बग़ावत से गुरेज़ाँ
अहमद कामरान
ख़्वाब यूँ ही नहीं होते पूरे
अहमद कामरान
दाना-ए-गंदुम-ए-बेदार उठाने लगा हूँ
अहमद कामरान
चराग़ ताक़-ए-तिलिस्मात में दिखाई दिया
अहमद कामरान
तुम मेरे साथ हो ये सच तो नहीं है लेकिन
अहमद कमाल परवाज़ी
तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँ
अहमद कमाल परवाज़ी
मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
अहमद कमाल परवाज़ी
ज़रा ज़रा सी कई कश्तियाँ बना लेना
अहमद कमाल परवाज़ी
ये गर्म रेत ये सहरा निभा के चलना है
अहमद कमाल परवाज़ी
तुझ से बिछड़ूँ तो तिरी ज़ात का हिस्सा हो जाऊँ
अहमद कमाल परवाज़ी
तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँ
अहमद कमाल परवाज़ी
फूल पर ओस का क़तरा भी ग़लत लगता है
अहमद कमाल परवाज़ी
ये क्या चीज़ तामीर करने चले हो
अहमद जावेद