Sad Poetry (page 323)
बन-बास
अहमद फ़राज़
ऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओ
अहमद फ़राज़
ऐ मेरे सारे लोगो
अहमद फ़राज़
अभी हम ख़ूबसूरत हैं
अहमद फ़राज़
यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ
अहमद फ़राज़
यूँ तो पहले भी हुए उस से कई बार जुदा
अहमद फ़राज़
ये तबीअत है तो ख़ुद आज़ार बन जाएँगे हम
अहमद फ़राज़
वो दुश्मन-ए-जाँ जान से प्यारा भी कभी था
अहमद फ़राज़
वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ
अहमद फ़राज़
वहशत-ए-दिल सिला-ए-आबला-पाई ले ले
अहमद फ़राज़
उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
अहमद फ़राज़
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अहमद फ़राज़
उस मंज़र-ए-सादा में कई जाल बंधे थे
अहमद फ़राज़
उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है
अहमद फ़राज़
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त
अहमद फ़राज़
तुझे है मश्क़-ए-सितम का मलाल वैसे ही
अहमद फ़राज़
तेरी बातें ही सुनाने आए
अहमद फ़राज़
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
अहमद फ़राज़
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
अहमद फ़राज़
तिरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जल्वागरी रही
अहमद फ़राज़
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
अहमद फ़राज़
सुकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ
अहमद फ़राज़
सू-ए-फ़लक न जानिब-ए-महताब देखना
अहमद फ़राज़
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
अहमद फ़राज़
शगुफ़्त-ए-गुल की सदा में रंग-ए-चमन में आओ
अहमद फ़राज़
साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले
अहमद फ़राज़
सामने उस के कभी उस की सताइश नहीं की
अहमद फ़राज़
सभी कहें मिरे ग़म-ख़्वार के अलावा भी
अहमद फ़राज़
सब क़रीने उसी दिलदार के रख देते हैं
अहमद फ़राज़
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
अहमद फ़राज़