Sad Poetry (page 321)
ज़ख़्म गिनता हूँ शब-ए-हिज्र में और सोचता हूँ
अहमद फ़रीद
सामने फिर मिरे अपने हैं सो मैं जानता हूँ
अहमद फ़रीद
अपना साया तो मैं दरिया में बहा आया था
अहमद फ़रीद
ये जो इक सैल-ए-फ़ना है मिरे पीछे पीछे
अहमद फ़रीद
जब से इक चाँद की चाहत में सितारा हुआ हूँ
अहमद फ़रीद
यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
अहमद फ़राज़
ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
अहमद फ़राज़
ये दिल का दर्द तो उम्रों का रोग है प्यारे
अहमद फ़राज़
ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है
अहमद फ़राज़
याद आई है तो फिर टूट के याद आई है
अहमद फ़राज़
वो वक़्त आ गया है कि साहिल को छोड़ कर
अहमद फ़राज़
वो अपने ज़ोम में था बे-ख़बर रहा मुझ से
अहमद फ़राज़
उस का क्या है तुम न सही तो चाहने वाले और बहुत
अहमद फ़राज़
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
अहमद फ़राज़
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
अहमद फ़राज़
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
अहमद फ़राज़
साक़ी ये ख़मोशी भी तो कुछ ग़ौर-तलब है
अहमद फ़राज़
सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की
अहमद फ़राज़
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
अहमद फ़राज़
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
अहमद फ़राज़
न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई
अहमद फ़राज़
न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है
अहमद फ़राज़
मेरी ख़ातिर न सही अपनी अना की ख़ातिर
अहमद फ़राज़
मैं ख़ुद को भूल चुका था मगर जहाँ वाले
अहमद फ़राज़
मैं भी पलकों पे सजा लूँगा लहू की बूँदें
अहमद फ़राज़
कितने नादाँ हैं तिरे भूलने वाले कि तुझे
अहमद फ़राज़
कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ
अहमद फ़राज़
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
अहमद फ़राज़
जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र
अहमद फ़राज़
जो ग़ज़ल आज तिरे हिज्र में लिक्खी है वो कल
अहमद फ़राज़