Sad Poetry (page 320)
दर-अस्ल ये नज़्म लिखी ही नहीं गई
अहमद हमेश
अपने जैसे आशिक़ों के नाम
अहमद हमेश
अंदेशा-ए-जाँ
अहमद हमेश
अबद
अहमद हमेश
आख़िरी मुकालिमा
अहमद हमेश
1973 की एक नज़्म
अहमद हमेश
तुम साथ चले थे तो मिरे साथ चला दिन
अहमद हमेश
सुब्ह-ए-फ़िराक़ अल-अमाँ वस्ल की शाम अल-अमाँ
अहमद हमेश
न घर है कोई न सामान कुछ रहा बाक़ी
अहमद हमेश
किस तवक़्क़ो' पे क्या उठा रखिए
अहमद हमेश
किस का शोअ'ला जल रहा है शो'लगी से मावरा
अहमद हमेश
कभी तुम ने कुछ तो दिया नहीं कभी हम ने कुछ तो लिया नहीं
अहमद हमेश
जहाँ से होता है प्यारे ख़ुदा का नाम शुरूअ'
अहमद हमेश
जब से मैं ख़ुद को खो रहा हूँ
अहमद हमेश
तू मयस्सर था तो दिल में थे हज़ारों अरमाँ
अहमद हमदानी
ये तेरी चाह भी क्या तेरी आरज़ू भी क्या
अहमद हमदानी
याद क्या क्या लोग दश्त-ए-बे-कराँ में आए थे
अहमद हमदानी
नित-नए रंग से करता रहा दिल को पामाल
अहमद हमदानी
नहीं मिलते वो अब तो क्या बात है
अहमद हमदानी
मुज़्तरिब हैं वक़्त के ज़र्रात सूरज से कहो
अहमद हमदानी
मुँह अँधेरे घर से निकले फिर थे हंगामे बहुत
अहमद हमदानी
लम्हा लम्हा कह रही हैं कुछ फ़ज़ाएँ आग की
अहमद हमदानी
कुछ उस को याद करूँ उस का इंतिज़ार करूँ
अहमद हमदानी
गर्द कैसी है ये धुआँ सा क्या
अहमद हमदानी
दिलों को रंज ये कैसा है ये ख़ुशी क्या है
अहमद हमदानी
दिल तुझे पा के भी तन्हा होता
अहमद हमदानी
चाँद ओझल हो गया हर इक सितारा बुझ गया
अहमद हमदानी
अज़ल अबद से बहुत दूर झूमते थे हम
अहमद हमदानी
अब ये होगा शायद अपनी आग में ख़ुद जल जाएँगे
अहमद हमदानी
ज़िंदगी! तुझ सा मुनाफ़िक़ भी कोई क्या होगा
अहमद फ़रीद