Sad Poetry (page 324)
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
अहमद फ़राज़
रात के पिछले पहर रोने के आदी रोए
अहमद फ़राज़
फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
अहमद फ़राज़
पेच रखते हो बहुत साहिबो दस्तार के बीच
अहमद फ़राज़
पयाम आए हैं उस यार-ए-बेवफ़ा के मुझे
अहमद फ़राज़
नज़र बुझी तो करिश्मे भी रोज़-ओ-शब के गए
अहमद फ़राज़
न सह सका जब मसाफ़तों के अज़ाब सारे
अहमद फ़राज़
न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
अहमद फ़राज़
न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो
अहमद फ़राज़
न दिल से आह न लब से सदा निकलती है
अहमद फ़राज़
मुंतज़िर कब से तहय्युर है तिरी तक़रीर का
अहमद फ़राज़
मिज़ाज हम से ज़ियादा जुदा न था उस का
अहमद फ़राज़
मंज़िलें एक सी आवारगीयाँ एक सी हैं
अहमद फ़राज़
मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकला
अहमद फ़राज़
ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें
अहमद फ़राज़
क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे
अहमद फ़राज़
ख़ुद को तिरे मेआर से घट कर नहीं देखा
अहमद फ़राज़
ख़ामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
अहमद फ़राज़
कशीदा सर से तवक़्क़ो अबस झुकाव की थी
अहमद फ़राज़
करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
अहमद फ़राज़
कल हम ने बज़्म-ए-यार में क्या क्या शराब पी
अहमद फ़राज़
कहा था किस ने कि अहद-ए-वफ़ा करो उस से
अहमद फ़राज़
जुज़ तिरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे
अहमद फ़राज़
जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए
अहमद फ़राज़
जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी
अहमद फ़राज़
जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो
अहमद फ़राज़
जब यार ने रख़्त-ए-सफ़र बाँधा कब ज़ब्त का पारा उस दिन था
अहमद फ़राज़
जब तुझे याद करें कार-ए-जहाँ खेंचता है
अहमद फ़राज़
जब तिरी याद के जुगनू चमके
अहमद फ़राज़
जब हर इक शहर बलाओं का ठिकाना बन जाए
अहमद फ़राज़