Sad Poetry (page 326)
यूँ दर्द ने उम्मीद के लड़ से मुझे बाँधा
अहमद फ़क़ीह
वक़्त के हर इक नक़्श का मअ'नी इतना बदला बदला होगा
अहमद फ़क़ीह
सदियों के अँधेरे में उतारा करे कोई
अहमद फ़क़ीह
शाख़-ए-अरमाँ की वही बे-सब्री आज भी है
अहमद अज़ीमाबादी
उन से भी पूछिए कभी अपनी ज़मीं का कर्ब
अहमद अज़ीम
इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक
अहमद अज़ीम
ऐ शाम-ए-हिज्र-ए-यार मिरी तू गवाही दे
अहमद अज़ीम
आहन ओ संग को ज़हराब-ए-फ़ना चाट गया
अहमद अज़ीम
क़र्या-ए-इंतिज़ार में उम्र गँवा के आए हैं
अहमद अज़ीम
मैं तो सोया भी न था क्यूँ ये दर-ए-ख़्वाब गिरा
अहमद अज़ीम
इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक
अहमद अज़ीम
इश्क़ में हो के मुब्तिला दिल ने कमाल कर दिया
अहमद अज़ीम
फ़ित्ना उठा तो रज़्म-गह-ए-ख़ाक से उठा
अहमद अज़ीम
दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया
अहमद अज़ीम
ऐसी भी कहाँ बे-सर-ओ-सामानी हुई है
अहमद अज़ीम
ऐसा इलाज-ए-हब्स-ए-दिल-ए-ज़ार चाहिए
अहमद अज़ीम
अब सोचिए तो दाम-ए-तमन्ना में आ गए
अहमद अज़ीम
यहाँ लिखना मनअ है
अहमद आज़ाद
उस लम्हे के लिए मुझे फ़ुर्सत नहीं
अहमद आज़ाद
नज़्म
अहमद आज़ाद
जो मेरे मरने का तमाशा नहीं देखना चाहती
अहमद आज़ाद
ये तिरा हिज्र अता दर्द अता कर्ब अता
अहमद अता
ये जो रातों को मुझे ख़्वाब नहीं आते 'अता'
अहमद अता
ये चादर एक अलामत बनी हुई थी यहाँ
अहमद अता
लोग हँसते हैं हमें देख के तन्हा तन्हा
अहमद अता
कोई ऐसा तो तिरे ब'अद नहीं रहना था
अहमद अता
ये मिरा वहम तो कुछ और सुना जाता है
अहमद अता
वो ज़माना है कि अब कुछ नहीं दीवाने में
अहमद अता
पहले हम अश्क थे फिर दीदा-ए-नम-नाक हुए
अहमद अता
मिरे लिए तिरा होना अहम ज़ियादा है
अहमद अता