Sad Poetry (page 327)
मैं न होने से हुआ या'नी बड़ी तक़्सीर की
अहमद अता
ख़्वाब का इज़्न था ता'बीर-ए-इजाज़त थी मुझे
अहमद अता
कल ख़्वाब में इक परी मिली थी
अहमद अता
इश्क़ से भाग के जाया भी नहीं जा सकता
अहमद अता
हुई ग़ज़ल ही न कुछ बात बन सकी हम से
अहमद अता
हमें न देखिए हम ग़म के मारे जैसे हैं
अहमद अता
हमारी आँखें भी साहिब अजीब कितनी हैं
अहमद अता
हमारा इश्क़ सलामत है यानी हम अभी हैं
अहमद अता
इक अश्क बहा होगा
अहमद अता
दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है
अहमद अता
बेबसी ऐसी भी होती है भला
अहमद अता
तर्क-ए-उल्फ़त के ब'अद भी 'अश्फ़ाक़'
अहमद अशफ़ाक़
लगता है कि इस दिल में कोई क़ैद है 'अश्फ़ाक़'
अहमद अशफ़ाक़
वो मिरी जुराअत-ए-कमयाब से ना-वाक़िफ़ हैं
अहमद अशफ़ाक़
तुम जो आ जाओ ग़म धुआँ हो जाए
अहमद अशफ़ाक़
सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से
अहमद अशफ़ाक़
गए दिनों की रक़ाबत को वो भुला न सके
अहमद अशफ़ाक़
दे के वो सारे इख़्तियार मुझे
अहमद अशफ़ाक़
वफ़ा कम है नज़र आती बहुत है
अहमद अल्वी
इस हाल में कब तक यूँही घुट घुट के जियूँगा
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
अब मैं हूँ और ख़्वाब-ए-परेशाँ है मेरे साथ
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
तख़्ता-ए-मश्क़-ए-सितम मुझ को बनाने वाला
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
सुकून-ए-क़ल्ब किसी को नहीं मयस्सर आज
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
नज़र बचा के वो हम से गुज़र गए चुप-चाप
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
मैं सोज़-ए-दरूँ अपना दिखा भी नहीं सकता
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
कौन है किस का ये पैग़ाम है क्या अर्ज़ करूँ
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
कर के असीर-ए-ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा मुझे
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
इब्न-ए-आदम बरसर पैकार है
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
हिंसा के पहले मुझे फिर रुला गया इक शख़्स
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
एहसास का वसीला-ए-इज़हार है ग़ज़ल
अहमद अली बर्क़ी आज़मी