Sad Poetry (page 33)

दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की

इब्न-ए-इंशा

बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ

इब्न-ए-इंशा

अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग

इब्न-ए-इंशा

अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले

इब्न-ए-इंशा

अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें

इब्न-ए-इंशा

आन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई

इब्न-ए-इंशा

ये सराए है

इब्न-ए-इंशा

ये कौन आया

इब्न-ए-इंशा

ये बच्चा किस का बच्चा है

इब्न-ए-इंशा

ये बातें झूटी बातें हैं

इब्न-ए-इंशा

सब माया है

इब्न-ए-इंशा

पिछले-पहर के सन्नाटे में

इब्न-ए-इंशा

फिर शाम हुई

इब्न-ए-इंशा

लब पर नाम किसी का भी हो

इब्न-ए-इंशा

कातिक का चाँद

इब्न-ए-इंशा

कल हम ने सपना देखा है

इब्न-ए-इंशा

इस बस्ती के इक कूचे में

इब्न-ए-इंशा

घूम रहा है पीत का प्यासा

इब्न-ए-इंशा

फ़र्ज़ करो

इब्न-ए-इंशा

दिल-आशोब

इब्न-ए-इंशा

दिल पीत की आग में जलता है

इब्न-ए-इंशा

दिल इक कुटिया दश्त किनारे

इब्न-ए-इंशा

दरवाज़ा खुला रखना

इब्न-ए-इंशा

चाँद के तमन्नाई

इब्न-ए-इंशा

ऐ मतवालो! नाक़ों वालो!!

इब्न-ए-इंशा

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा

इब्न-ए-इंशा

सुनते हैं फिर छुप छुप उन के घर में आते जाते हो

इब्न-ए-इंशा

शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती

इब्न-ए-इंशा

राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा

इब्न-ए-इंशा

लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए

इब्न-ए-इंशा