Sad Poetry (page 34)
किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगे
इब्न-ए-इंशा
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
इब्न-ए-इंशा
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो
इब्न-ए-इंशा
जल्वा-नुमाई बे-परवाई हाँ यही रीत जहाँ की है
इब्न-ए-इंशा
जब दहर के ग़म से अमाँ न मिली हम लोगों ने इश्क़ ईजाद किया
इब्न-ए-इंशा
इस शहर के लोगों पे ख़त्म सही ख़ु-तलअ'ती-ओ-गुल-पैरहनी
इब्न-ए-इंशा
'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
इब्न-ए-इंशा
'इंशा'-जी है नाम उन्ही का चाहो तो तुम से मिलवाएँ
इब्न-ए-इंशा
हम जंगल के जोगी हम को एक जगह आराम कहाँ
इब्न-ए-इंशा
हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने
इब्न-ए-इंशा
दिल किस के तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है
इब्न-ए-इंशा
दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो
इब्न-ए-इंशा
दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो
इब्न-ए-इंशा
देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ
इब्न-ए-इंशा
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का
इब्न-ए-इंशा
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले
इब्न-ए-इंशा
क्या ख़बर थी इंक़लाब आसमाँ हो जाएगा
हुसैन मीर काश्मीरी
'माजिद' ख़ुदा के वास्ते कुछ देर के लिए
हुसैन माजिद
तूफ़ाँ कोई नज़र में न दरिया उबाल पर
हुसैन माजिद
शाम छत पर उतर गई होगी
हुसैन माजिद
लोगों ने आकाश से ऊँचा जा कर तमग़े पाए
हुसैन माजिद
धूल-भरी आँधी में सब को चेहरा रौशन रखना है
हुसैन माजिद
फिर तिरा शहर तिरी राहगुज़र हो कि न हो
हुसैन ताज रिज़वी
मैं उस की आँख में वो मेरे दिल की सैर में था
हुसैन ताज रिज़वी
माहौल से जैसे कि घुटन होने लगी है
हुसैन ताज रिज़वी
है मेरे गिर्द यक़ीनन कहीं हिसार सा कुछ
हुसैन ताज रिज़वी
ढली जो शाम नज़र से उतर गया सूरज
हुसैन ताज रिज़वी
किरन किरन के दरख़्शंदा बाब मेरे हैं
हुसैन सहर
इतनी सी इस जहाँ की हक़ीक़त है और बस
हुसैन सहर