Sad Poetry (page 32)

न कू-ए-यार में ठहरा न अंजुमन में रहा

इब्राहीम अश्क

मुझे न देखो मिरे जिस्म का धुआँ देखो

इब्राहीम अश्क

मोहब्बतों में जो मिट मिट के शाहकार हुआ

इब्राहीम अश्क

मिशअल-ब-कफ़ कभी तो कभी दिल-ब-दस्त था

इब्राहीम अश्क

मैं कब रहीन-ए-रेग-ए-बयाबान-ए-यास था

इब्राहीम अश्क

गुलशन में ले के चल किसी सहरा में ले के चल

इब्राहीम अश्क

दुनिया लुटी तो दूर से तकता ही रह गया

इब्राहीम अश्क

देखा तो कोई और था सोचा तो कोई और

इब्राहीम अश्क

करता हूँ एक ख़्वाब के मुबहम नुक़ूश याद

इब्राहीम होश

जो चुप लगाऊँ तो सहरा की ख़ामुशी जागे

इब्राहीम होश

मैं वो नहीं कि ज़माने से बे-अमल जाऊँ

इब्राहीम होश

दरिया में है सराब अजब इब्तिला में हूँ

इब्राहीम होश

दैर-ओ-हरम में दश्त-ओ-बयाबान-ओ-बाग़ में

इब्राहीम होश

देख कर मेरा दश्त-ए-तन्हाई

इब्न-ए-सफ़ी

ज़ेहन से दिल का बार उतरा है

इब्न-ए-सफ़ी

राह-ए-तलब में कौन किसी का अपने भी बेगाने हैं

इब्न-ए-सफ़ी

बड़े ग़ज़ब का है यारो बड़े अज़ाब का ज़ख़्म

इब्न-ए-सफ़ी

क्या क्या हैं गिले उस को बता क्यूँ नहीं देता

इब्न-ए-रज़ा

याद का क्या है आ गई फिर से

इब्न-ए-मुफ़्ती

तेरे ख़्वाबों की लत लगी जब से

इब्न-ए-मुफ़्ती

इक ज़रा सी बात पे ये मुँह बनाना रूठना

इब्न-ए-मुफ़्ती

मकड़ी

इब्न-ए-मुफ़्ती

अजब है खेल कैरम का

इब्न-ए-मुफ़्ती

शौक़ जब भी बंदगी का रहनुमा होता नहीं

इब्न-ए-मुफ़्ती

दिल वही अश्क-बार रहता है

इब्न-ए-मुफ़्ती

बर्क़ ने जब भी आँख खोली है

इब्न-ए-मुफ़्ती

यूँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँही तो नहीं जोग लिया

इब्न-ए-इंशा

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर

इब्न-ए-इंशा

हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे

इब्न-ए-इंशा

दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो

इब्न-ए-इंशा