Sad Poetry (page 36)

कहानी को मुकम्मल जो करे वो बाब उठा लाई

हुमैरा राहत

हवा के साथ ये कैसा मोआमला हुआ है

हुमैरा राहत

हर एक ख़्वाब की ताबीर थोड़ी होती है

हुमैरा राहत

बारिश के क़तरे के दुख से ना-वाक़िफ़ हो

हुमैरा राहत

आँखों से किसी ख़्वाब को बाहर नहीं देखा

हुमैरा राहत

तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो

होश तिर्मिज़ी

दिल को ग़म रास है यूँ गुल को सबा हो जैसे

होश तिर्मिज़ी

दश्त-ए-वफ़ा में जल के न रह जाएँ अपने दिल

होश तिर्मिज़ी

वो तक़ाज़ा-ए-जुनूँ अब के बहारों में न था

होश तिर्मिज़ी

तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो

होश तिर्मिज़ी

पास-ए-नामूस-ए-तमन्ना हर इक आज़ार में था

होश तिर्मिज़ी

मिलता नहीं मिज़ाज ख़ुद अपनी अदा में है

होश तिर्मिज़ी

लाएगा रंग ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ देखते रहो

होश तिर्मिज़ी

कभी आहें कभी नाले कभी आँसू निकले

होश तिर्मिज़ी

गो दाग़ हो गए हैं वो छाले पड़े हुए

होश तिर्मिज़ी

दिल को ग़म रास है यूँ गुल को सबा हो जैसे

होश तिर्मिज़ी

देखे हैं जो ग़म दिल से भुलाए नहीं जाते

होश तिर्मिज़ी

पहले तो ख़्वाब ज़ेहन में तश्कील हो गया

हीरानंद सोज़

कोई मोनिस नहीं मेरा कोई ग़म-ख़्वार नहीं

हीरानंद सोज़

कोई भी शख़्स जो वहम-ओ-गुमाँ की ज़द में रहा

हीरानंद सोज़

जिसे मिलें वही तन्हा दिखाई देता है

हीरानंद सोज़

उन के सब झूट मो'तबर ठहरे

हिना हैदर

ये कैसा क़ाफ़िला है जिस में सारे लोग तन्हा हैं

हिमायत अली शाएर

सूरज को ये ग़म है कि समुंदर भी है पायाब

हिमायत अली शाएर

सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते

हिमायत अली शाएर

शम्अ के मानिंद अहल-ए-अंजुमन से बे-नियाज़

हिमायत अली शाएर

फिर मिरी आस बढ़ा कर मुझे मायूस न कर

हिमायत अली शाएर

इस दश्त-ए-सुख़न में कोई क्या फूल खिलाए

हिमायत अली शाएर

इस दश्त पे एहसाँ न कर ऐ अब्र-ए-रवाँ और

हिमायत अली शाएर

यूसुफ़-ए-सानी

हिमायत अली शाएर