Sad Poetry (page 330)

फ़स्ल-ए-गुल में है इरादा सू-ए-सहरा अपना

आग़ा हज्जू शरफ़

दिल को लटका लिया है गेसू में

आग़ा हज्जू शरफ़

दिल को अफ़सोस-ए-जवानी है जवानी अब कहाँ

आग़ा हज्जू शरफ़

दरपेश अजल है गंज-ए-शहीदाँ ख़रिदिए

आग़ा हज्जू शरफ़

चाहिएँ मुझ को नहीं ज़र्रीं क़फ़स की पुतलियाँ

आग़ा हज्जू शरफ़

बुलबुल का दिल ख़िज़ाँ के सदमे से हिल रहा है

आग़ा हज्जू शरफ़

आलम में हरे होंगे अश्जार जो मैं रोया

आग़ा हज्जू शरफ़

आग लगा दी पहले गुलों ने बाग़ में वो शादाबी की

आग़ा हज्जू शरफ़

पेश आने लगे हैं नफ़रत से

अफ़ज़ल पेशावरी

नौजवानी में अजब दिल की लगी होती है

अफ़ज़ल पेशावरी

वक़्त के तूफ़ानी सागर में क्रोध कपट के रेले हैं

अफ़ज़ल परवेज़

लैला सर-ब-गरेबाँ है मजनूँ सा आशिक़-ए-ज़ार कहाँ

अफ़ज़ल परवेज़

ख़ुश-क़िस्मत हैं वो जो गाँव में लम्बी तान के सोते हैं

अफ़ज़ल परवेज़

कारज़ार-ए-इश्क़-ओ-सर-मस्ती में नुसरत-याब हों

अफ़ज़ल परवेज़

जो दर्द-ए-दिल कहो आहिस्ता बोलो

अफ़ज़ल परवेज़

रह-ए-सुलूक में बल डालने पे रहता है

अफ़ज़ाल नवेद

पानी शजर पे फूल बना देखता रहा

अफ़ज़ाल नवेद

न रोना रह गया बाक़ी न हँसना रह गया बाक़ी

अफ़ज़ाल नवेद

मकान-ए-ख़्वाब में जंगल की बास रहने लगी

अफ़ज़ाल नवेद

ख़ाली हुआ गिलास नशा सर में आ गया

अफ़ज़ाल नवेद

इक धन को एक धन से अलग कर लूँ और गाऊँ

अफ़ज़ाल नवेद

दिखाई दे कि शुआ-ए-बसीर खींचता हूँ

अफ़ज़ाल नवेद

अपने ही तले आई ज़मीनों से निकल कर

अफ़ज़ाल नवेद

आँचल में नज़र आती हैं कुछ और सी आँखें

अफ़ज़ाल नवेद

ज़िंदगी इतनी परेशाँ है ये सोचा भी न था

अफ़ज़ल मिनहास

ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तो

अफ़ज़ल मिनहास

मुझे बतलाईए अब कौन सी जीने की सूरत है

अफ़ज़ल मिनहास

मिटते हुए नुक़ूश-ए-वफ़ा को उभारिए

अफ़ज़ल मिनहास

मैं फ़क़त इस जुर्म में दुनिया में रुस्वा हो गया

अफ़ज़ल मिनहास

कर्ब के शहर से निकले तो ये मंज़र देखा

अफ़ज़ल मिनहास