Sad Poetry (page 331)

काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी

अफ़ज़ल मिनहास

गुम-सुम हवा के पेड़ से लिपटा हुआ हूँ में

अफ़ज़ल मिनहास

गिर पड़ा तू आख़िरी ज़ीने को छू कर किस लिए

अफ़ज़ल मिनहास

गहरा सुकूत ज़ेहन को बेहाल कर गया

अफ़ज़ल मिनहास

एक पैकर यूँ चमक उट्ठा है मेरे ध्यान में

अफ़ज़ल मिनहास

चुप रहे तो शहर की हंगामा आराई मिली

अफ़ज़ल मिनहास

अपने माहौल से कुछ यूँ भी तो घबराए न थे

अफ़ज़ल मिनहास

अपने माहौल से कुछ यूँ भी तो घबराए न थे

अफ़ज़ल मिनहास

तेरे जाने से ज़्यादा हैं न कम पहले थे

अफ़ज़ल ख़ान

शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना

अफ़ज़ल ख़ान

सज़ा-ए-मौत पे फ़रियाद से तो बेहतर है

अफ़ज़ल ख़ान

मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी

अफ़ज़ल ख़ान

डुबो रहा है मुझे डूबने का ख़ौफ़ अब तक

अफ़ज़ल ख़ान

अब जो पत्थर है आदमी था कभी

अफ़ज़ल ख़ान

वो जो इक शख़्स वहाँ है वो यहाँ कैसे हो

अफ़ज़ल ख़ान

उस लम्हे तिश्ना-लब रेत भी पानी होती है

अफ़ज़ल ख़ान

तो फिर वो इश्क़ ये नक़्द-ओ-नज़र बराए-फ़रोख़्त

अफ़ज़ल ख़ान

शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना

अफ़ज़ल ख़ान

नहीं था ध्यान कोई तोड़ते हुए सिगरेट

अफ़ज़ल ख़ान

मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी

अफ़ज़ल ख़ान

कल अपने शहर की बस में सवार होते हुए

अफ़ज़ल ख़ान

जब इक सराब में प्यासों को प्यास उतारती है

अफ़ज़ल ख़ान

आदमी ख़्वार भी होता है नहीं भी होता

अफ़ज़ल ख़ान

तुम्हें ही सहरा सँभालने की पड़ी हुई है

अफ़ज़ल गौहर राव

क्या मुसीबत है कि हर दिन की मशक़्क़त के एवज़

अफ़ज़ल गौहर राव

किस प्यास से ख़ाली हुआ मश्कीज़ा हमारा

अफ़ज़ल गौहर राव

हिज्र में इतना ख़सारा तो नहीं हो सकता

अफ़ज़ल गौहर राव

एक ही दाएरे में क़ैद हैं हम लोग यहाँ

अफ़ज़ल गौहर राव

ज़मीं से आगे भला जाना था कहाँ मैं ने

अफ़ज़ल गौहर राव

ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले

अफ़ज़ल गौहर राव