Sad Poetry (page 55)

ग़म-ज़दा ज़िंदगी रही न रही

हरी मेहता

हाँ वो दिन याद हैं जब हम भी कहा करते थे

हरी चंद अख़्तर

उमीदों से दिल-ए-बर्बाद को आबाद करता हूँ

हरी चंद अख़्तर

सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं

हरी चंद अख़्तर

शैख़ ओ पंडित धर्म और इस्लाम की बातें करें

हरी चंद अख़्तर

सैर-ए-दुनिया से ग़रज़ थी महव-ए-दुनिया कर दिया

हरी चंद अख़्तर

जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है

हरी चंद अख़्तर

जम्अ हैं सारे मुसाफ़िर ना-ख़ुदा-ए-दिल के पास

हरी चंद अख़्तर

ग़ुरूर-ज़ब्त से आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक बात आ पहुँची

हरी चंद अख़्तर

गधों का चैलन्ज

हरफ़न लखनवी

तेरे हुस्न की ख़ैर बना दे इक दिन का सुल्तान मुझे

हरबंस तसव्वुर

क़दम क़दम है अंधा मोड़

हरबंस तसव्वुर

मंज़र दे बीनाई दे

हरबंस तसव्वुर

ख़ामुशी से सवाल मेरा था

हरबंस तसव्वुर

दश्त में मिस्ल सदा के थे

हरबंस तसव्वुर

ये क्या ख़बर थी कि जब तुम से दोस्ती होगी

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

वो पेच-ओ-ख़म जहाँ की हर इक रहगुज़र में है

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

वो मद प्याले लुंढाते ही रहे बस

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

तुम आए जब नहीं नाकाम लौट जाने को

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

फिर उन की याद के दीपक जलाए हैं मैं ने

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

कौन है जो न हुआ बंदिश-ए-ग़म से आज़ाद

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

जितने क़रीं तुम आए

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

फ़ैज़-ए-दिल से मुतरिब-ए-कामिल हुआ जाता हूँ मैं

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

अश्कों का मिरी आँख से पैग़ाम न आए

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

तख़लीक़-ए-बे-सबात का ज़र्रा-नज़ीर हूँ

हक़ीर जहानी

सैद को रश्क-ए-चमन दाम ने रहने न दिया

हक़ीर जहानी

मुझे अब मौत बेहतर ज़िंदगी से

हक़ीर

छा गई एक मुसीबत की घटा चार तरफ़

हक़ीर

साक़िया ऐसा पिला दे मय का मुझ को जाम तल्ख़

हक़ीर

ना-तवाँ वो हूँ कि दम भर नहीं बैठा जाता

हक़ीर