Sharab Poetry (page 41)

जितना था सरगर्म-ए-कार उतना ही दिल नाकाम था

आरज़ू लखनवी

हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की

आरज़ू लखनवी

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना

आरज़ू लखनवी

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी

आरज़ू लखनवी

ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा

आरज़ू लखनवी

उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं

अर्शी भोपाली

शौक़-ए-आवारा दश्त-ओ-दर से है

अर्शी भोपाली

नशीली छाँव में बीते हुए ज़मानों को

अर्शी भोपाली

न पयाम चाहते हैं न कलाम चाहते हैं

अरशद सिद्दीक़ी

सुरूर-ए-इश्क़ ने उल्फ़त से बाँध रक्खा है

अरशद लतीफ़

जाने शब को क्या सूझी थी रिंदों को समझाने आए

अरशद काकवी

जीना है एक शग़्ल सो करते रहे हैं हम

अरशद काकवी

क्या कहूँ कितना फ़ुज़ूँ है तेरे दीवाने का दुख

अरशद जमाल 'सारिम'

जुड़े हुए हैं परी-ख़ाने मेरे काग़ज़ से

अरशद जमाल 'सारिम'

कुछ दर्जा और गर्मी-ए-बाज़ार हो बुलंद

अरशद जमाल हश्मी

मय जो दी ग़ैर को साक़ी ने कराहत देखो

अरशद अली ख़ान क़लक़

हुआ मैं रिंद-मशरब ख़ाक मर कर इस तमन्ना में

अरशद अली ख़ान क़लक़

हिम्मत का ज़ाहिदों की सरासर क़ुसूर था

अरशद अली ख़ान क़लक़

यार के नर्गिस-ए-बीमार का बीमार रहा

अरशद अली ख़ान क़लक़

तासीर जज़्ब मस्तों की हर हर ग़ज़ल में है

अरशद अली ख़ान क़लक़

शरफ़ इंसान को कब ज़िल्ल-ए-हुमा देता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

रग-ओ-पै में भरा है मेरे शोर उस की मोहब्बत का

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव-ए-रुख़ का तिरे दिल में गुज़र रहता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव पड़ा जो आरिज़-ए-गुलगून-ए-यार का

अरशद अली ख़ान क़लक़

नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से

अरशद अली ख़ान क़लक़

न वो ख़ुशबू है गुलों में न ख़लिश ख़ारों में

अरशद अली ख़ान क़लक़

लूटे मज़े जो हम ने तुम्हारे उगाल के

अरशद अली ख़ान क़लक़

लुट रही है दौलत-ए-दीदार क़ैसर-बाग़ में

अरशद अली ख़ान क़लक़

जो साक़िया तू ने पी के हम को दिया है जाम-ए-शराब आधा

अरशद अली ख़ान क़लक़

चश्मक-ज़नी में करती नहीं यार का लिहाज़

अरशद अली ख़ान क़लक़