ख्वाब Poetry (page 107)
हाथ में आफ़्ताब पिघला कर
आदिल मंसूरी
हर ख़्वाब काली रात के साँचे में ढाल कर
आदिल मंसूरी
घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में
आदिल मंसूरी
दूर उफ़ुक़ के पार से आवाज़ के पर्वरदिगार
आदिल मंसूरी
बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था
आदिल मंसूरी
आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के
आदिल मंसूरी
दुम
आदिल लखनवी
हर इक जवाब की तह में सवाल आएगा
आदिल हयात
अर्सा-ए-माह-ओ-साल से गुज़रे
आदिल फ़रीदी
तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए
अदीम हाशमी
लोगों के दर्द अपनी पशेमानियाँ मिलीं
अदीम हाशमी
क्यूँ मिरे लब पे वफ़ाओं का सवाल आ जाए
अदीम हाशमी
कोई पत्थर कोई गुहर क्यूँ है
अदीम हाशमी
आया हूँ संग ओ ख़िश्त के अम्बार देख कर
अदीम हाशमी
आँखों में आँसुओं को उभरने नहीं दिया
अदीम हाशमी
प्यार करते रहो
अदील ज़ैदी
सहरा-ओ-दश्त-ओ-सर्व-ओ-समन का शरीक था
अदील ज़ैदी
मोहब्बत की सज़ा पाई बहुत है
अदील ज़ैदी
ख़ाली दुनिया में गुज़र क्या करते
अदील ज़ैदी
जहान-ए-इल्म का बाब-ए-निसाब होते हुए
अदील ज़ैदी
नहीं किसी की तवज्जोह ख़ुद-आगही की तरफ़
अदीब सहारनपुरी
किस की ख़ल्वत से निखर कर सुब्ह-दम आती है धूप
अदीब ख़लवत
साज़-ए-सुख़न बहाना है
अदा जाफ़री
मैं साज़ ढूँडती रही
अदा जाफ़री
ज़बाँ को हुक्म निगाह-ए-करम को पहचाने
अदा जाफ़री
यही नहीं कि ज़ख़्म-ए-जाँ को चारा-जू मिला नहीं
अदा जाफ़री
वैसे ही ख़याल आ गया है
अदा जाफ़री
रोज़-ओ-शब की कोई सूरत तो बना कर रख्खूँ
अदा जाफ़री
मुझे रंग-ए-ख़्वाब से ज़िंदगी का यक़ीं मिला
अदा जाफ़री
कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा
अदा जाफ़री