ख्वाब Poetry (page 108)
ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था
अदा जाफ़री
काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या
अदा जाफ़री
कहते हैं कि अब हम से ख़ता-कार बहुत हैं
अदा जाफ़री
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
जब दिल की रहगुज़र पे तिरा नक़्श-ए-पा न था
अदा जाफ़री
होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
अदा जाफ़री
हिस नहीं तड़प नहीं बाब-ए-अता भी क्यूँ खुले
अदा जाफ़री
हर गाम सँभल सँभल रही थी
अदा जाफ़री
गुलों सी गुफ़्तुगू करें क़यामतों के दरमियाँ
अदा जाफ़री
चाक-ए-दिल भी कभी सिलते होंगे
अदा जाफ़री
आलम ही और था जो शनासाइयों में था
अदा जाफ़री
गया तो हुस्न न दीवार में न दर में था
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
तमाम हिज्र उसी का विसाल है उस का
अबुल हसनात हक़्क़ी
शब को हर रंग में सैलाब तुम्हारा देखें
अबुल हसनात हक़्क़ी
नुमू तो पहले भी था इज़्तिराब मैं ने दिया
अबुल हसनात हक़्क़ी
है आम अज़ल ही से फ़ैज़ान मोहब्बत का
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
ये बंदगी का सदा अब समाँ रहे न रहे
अबु मोहम्मद वासिल
तसव्वुरात में इन को बुला के देख लिया
अबु मोहम्मद वासिल
जबीन-ए-शौक़ पर कोई हुआ है मेहरबाँ शायद
अबु मोहम्मद वासिल
दिल में उन का ख़याल आता है
अबु मोहम्मद वासिल
अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती
अबु मोहम्मद वासिल
सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए
अबु मोहम्मद सहर
ख़्वाबों का नश्शा है न तमन्ना का सिलसिला
अबु मोहम्मद सहर
खो के देखा था पा के देख लिया
अबु मोहम्मद सहर
हर ख़ौफ़ हर ख़तर से गुज़रना भी सीखिए
अबु मोहम्मद सहर
तीर-अंदाजों को अंदाज़ा नहीं
अबसार अब्दुल अली
दिखाई ख़्वाब में दी थी टुक इक मुँह की झलक हम कूँ
आबरू शाह मुबारक
मोहब्बत सेहर है यारो अगर हासिल हो यक-रूई
आबरू शाह मुबारक
क्या शोख़ अचपले हैं तेरे नयन ममोला
आबरू शाह मुबारक