ख्वाब Poetry (page 110)

क्या जानिए क्या है हद-ए-इदराक से आगे

अबरार अहमद

कुछ काम नहीं है यहाँ वहशत के बराबर

अबरार अहमद

कोई सोचे न हमें कोई पुकारा न करे

अबरार अहमद

कहीं पर सुब्ह रखता हूँ कहीं पर शाम रखता हूँ

अबरार अहमद

जो भी यकजा है बिखरता नज़र आता है मुझे

अबरार अहमद

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है

अबरार अहमद

गुरेज़ाँ था मगर ऐसा नहीं था

अबरार अहमद

इक फ़रामोश कहानी में रहा

अबरार अहमद

और क्या रह गया है होने को

अबरार अहमद

तेरी दुनिया की कज-अदाई से

आबिद वदूद

हाथ में माहताब हो जैसे

आबिद वदूद

यहाँ वहाँ हैं कई ख़्वाब जगमगाते हुए

आबिद सयाल

कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई

आबिद सयाल

कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई

आबिद सयाल

कफ़-ए-ख़िज़ाँ पे खिला मैं इस ए'तिबार के साथ

आबिद सयाल

ज़िंदगी भर जिन्हों ने देखे ख़्वाब

आबिद मुनावरी

क्यूँ न अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे इतराती हवा

आबिद मुनावरी

और किस का घर कुशादा है कहाँ ठहरेगी रात

आबिद मुनावरी

अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे

आबिद मुनावरी

सब मुझे ढूँडने निकले हैं बुझा कर आँखें

आबिद मलिक

शहर से जब भी कोई शहर जुदा होता है

आबिद मलिक

आसूदगान-ए-हिज्र से मिलने की चाह में

आबिद मलिक

आख़िरी बार ज़माने को दिखाया गया हूँ

आबिद मलिक

किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा

आबिद ख़ुर्शीद

आलम-ए-ख़्वाब सही ख़्वाब में चलते रहिए

आबिद करहानी

श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा

आबिद हशरी

रात

आबिद आलमी

मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी

आबिद आलमी

ख़्वाब में गर कोई कमी होती

आबिद आलमी

जब भी कमरे में कुछ हवा आई

आबिद आलमी