ख्वाब Poetry (page 109)

फ़जर उठ ख़्वाब सीं गुलशन में जब तुम ने मली अँखियाँ

आबरू शाह मुबारक

क्या क्या धरे अजूबे हैं शहर-ए-ख़याल में

अबरार हामिद

ख़ुशी के वक़्त भी तुझ को मलाल कैसा है

अबरार हामिद

ख़ुश-बख़्त हैं आज़ाद हैं जो अपने सुख़न में

अबरार हामिद

दिए की लौ से न जल जाए तीरगी शब की

अबरार हामिद

ख़ुशनुमा दीवार-ओ-दर के ख़्वाब ही देखा किए

अबरार आज़मी

तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था

अबरार आज़मी

ख़याल लम्स का कार-ए-सवाब जैसा था

अबरार आज़मी

धूप चमकी रात की तस्वीर पीली हो गई

अबरार आज़मी

भर लाए हैं हम आँख में रखने को मुक़ाबिल

अबरार अहमद

पिछले पहर की दस्तक

अबरार अहमद

पस-मंज़र की आवाज़

अबरार अहमद

मिट्टी थी किस जगह की

अबरार अहमद

मेरे पास क्या कुछ नहीं

अबरार अहमद

मौत दिल से लिपट गई उस शब

अबरार अहमद

कहीं टूटते हैं

अबरार अहमद

हम कि इक भेस लिए फिरते हैं

अबरार अहमद

हवा जब तेज़ चलती है

अबरार अहमद

हमारे दुखों का इलाज कहाँ है

अबरार अहमद

दवाम-ए-वस्ल का ख़्वाब

अबरार अहमद

आँखें तरस गई हैं

अबरार अहमद

आख़िरी दिन से पहले

अबरार अहमद

ज़मीं नहीं ये मिरी आसमाँ नहीं मेरा

अबरार अहमद

ये यक़ीं ये गुमाँ ही मुमकिन है

अबरार अहमद

ये रह-ए-इश्क़ है इस राह पे गर जाएगा तू

अबरार अहमद

ये भी तो कमाल हो गया है

अबरार अहमद

यक़ीन है कि गुमाँ है मुझे नहीं मालूम

अबरार अहमद

तुझ से वाबस्तगी रहेगी अभी

अबरार अहमद

राह दुश्वार भी है बे-सर-ओ-सामानी भी

अबरार अहमद

क़िस्से से तिरे मेरी कहानी से ज़ियादा

अबरार अहमद