ख्वाब Poetry (page 43)
कोई तसव्वुर में जल्वा-गर है बहार दिल में समा रही है
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
मैं सुब्ह ख़्वाब से जागा तो ये ख़याल आया
फ़ैज़ी
जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का
फ़ैज़ी
अच्छा है तू ने इन दिनों देखा नहीं मुझे
फ़ैज़ी
मैं उस को ख़्वाब में कुछ ऐसे देखा करता था
फ़ैज़ान हाशमी
मिरे वजूद को मौजूदगी दिखाती थी
फ़ैज़ान हाशमी
इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की
फ़ैज़ान हाशमी
हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह
फ़ैज़ुल हसन
दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ
फ़ैज़ ख़लीलाबादी
वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ज़िंदाँ की एक सुब्ह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ज़िंदाँ की एक शाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ये किस दयार-ए-अदम में...
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
यहाँ से शहर को देखो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
टूटी जहाँ जहाँ पे कमंद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तीन मंज़र
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तीन आवाज़ें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तन्हाई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तह-ए-नुजूम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सुरुद-ए-शबाना
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सुरुद-ए-शबाना
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सुरूद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शोर-ए-बरबत-ओ-नय
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शाह-राह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
रक़ीब से!
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
क़ैद-ए-तन्हाई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
पैरिस
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़