ख्वाब Poetry (page 41)
यक़ीन
फ़रीद इशरती
जब तमन्नाएँ मुस्कुराती हैं
फ़रीद इशरती
ग़म का बादल
फ़रीद इशरती
फ़नकार और मौत
फ़रीद इशरती
बे-बाक अँधेरे
फ़रीद इशरती
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
फ़रीद इशरती
जला के दामन-ए-हस्ती का तार तार उठा
फ़रीद इशरती
इक दिल की ख़ातिर इतने तो फ़ित्ने कभी न थे
फ़राज़ सुल्तानपूरी
अश्क-ए-ग़म आँखों ने बरसाया बहुत
फ़राज़ सुल्तानपूरी
सदा-ए-कुन से भी पहले किसी जहान में थे
फ़राज़ महमूद फ़ारिज़
वो मेरे बारे में ऐसे भी सोचता कब था
फ़रह इक़बाल
सारे मंज़र दिलकश थे हर बात सुहानी लगती थी
फ़रह इक़बाल
मुद्दतों हम से मुलाक़ात नहीं करते हैं
फ़रह इक़बाल
कोई जब मिल के मुस्कुराया था
फ़रह इक़बाल
कैसे मंज़र हैं जो इदराक में आ जाते हैं
फ़रह इक़बाल
देखा पलट के जब भी तो फैला ग़ुबार था
फ़रह इक़बाल
दर्द का समुंदर है सिर्फ़ पार होने तक
फ़रह इक़बाल
यारो हुदूद-ए-ग़म से गुज़रने लगा हूँ मैं
फ़राग़ रोहवी
कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है
फ़राग़ रोहवी
कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है
फ़राग़ रोहवी
दिन में भी हसरत-ए-महताब लिए फिरते हैं
फ़राग़ रोहवी
मैं ख़ुश हुआ कि बूद में रक्खा गया मुझे
फ़क़ीह हैदर
वो सुब्ह-ए-ईद का मंज़र तिरे तसव्वुर में
फ़ानी बदायुनी
हम हैं उस के ख़याल की तस्वीर
फ़ानी बदायुनी
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
फ़ानी बदायुनी
ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए
फ़ानी बदायुनी
ज़बाँ मुद्दआ-आश्ना चाहता हूँ
फ़ानी बदायुनी
ये किस क़यामत की बेकसी है ज़मीं ही अपना न यार मेरा
फ़ानी बदायुनी
वो पूछते हैं हिज्र में है इज़्तिराब क्या
फ़ानी बदायुनी
वा-ए-नादानी ये हसरत थी कि होता दर खुला
फ़ानी बदायुनी