ख्वाब Poetry (page 42)
तिरी तिरछी नज़र का तीर है मुश्किल से निकलेगा
फ़ानी बदायुनी
क़सम न खाओ तग़ाफ़ुल से बाज़ आने की
फ़ानी बदायुनी
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मा'लूम
फ़ानी बदायुनी
मिज़ाज-ए-दहर में उन का इशारा पाए जा
फ़ानी बदायुनी
मर कर तिरे ख़याल को टाले हुए तो हैं
फ़ानी बदायुनी
क्या छुपाते किसी से हाल अपना
फ़ानी बदायुनी
कुछ कम तो हुआ रंज-ए-फ़रावान-ए-तमन्ना
फ़ानी बदायुनी
ख़ुदा असर से बचाए इस आस्ताने को
फ़ानी बदायुनी
ख़ल्क़ कहती है जिसे दिल तिरे दीवाने का
फ़ानी बदायुनी
इब्तिदा-ए-इश्क़ है लुत्फ़-ए-शबाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
हर घड़ी इंक़लाब में गुज़री
फ़ानी बदायुनी
ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए
फ़ानी बदायुनी
अब उन्हें अपनी अदाओं से हिजाब आता है
फ़ानी बदायुनी
दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते
फ़ना निज़ामी कानपुरी
या रब मिरी हयात से ग़म का असर न जाए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त
फ़ना बुलंदशहरी
न दहर में न हरम में जबीं झुकी होगी
फ़ना बुलंदशहरी
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
फ़ना बुलंदशहरी
जब तक मिरे होंटों पे तिरा नाम रहेगा
फ़ना बुलंदशहरी
दुनिया के हर ख़याल से बेगाना कर दिया
फ़ना बुलंदशहरी
अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता
फ़ना बुलंदशहरी
अब तसव्वुर में हरम है न सनम-ख़ाना है
फ़ना बुलंदशहरी
आँखों में नमी आई चेहरे पे मलाल आया
फ़ना बुलंदशहरी
मज़दूर औरतें
फख्र ज़मान
वो पहले अंधे कुएँ में गिराए जाते हैं
फख्र ज़मान
उस ने किया हिजाब मिरे देखने के बा'द
फख़्र अब्बास
ग़ज़लें लिख लिख पागल होने वाला हूँ
फख़्र अब्बास
तसव्वुर में कोई आया सुकून-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ हो कर
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी