Heart Broken Poetry (page 117)

ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं

फ़ाज़िल जमीली

पुराने यार भी आपस में अब नहीं मिलते

फ़ाज़िल जमीली

मैं ही अपनी क़ैद में था और मैं ही एक दिन

फ़ाज़िल जमीली

मैं इक थका हुआ इंसान और क्या करता

फ़ाज़िल जमीली

मैं अपने आप से आगे निकलने वाला था

फ़ाज़िल जमीली

मैं अक्सर खो सा जाता हूँ गली-कूचों के जंगल में

फ़ाज़िल जमीली

अब कौन जा के साहिब-ए-मिम्बर से ये कहे

फ़ाज़िल जमीली

सरहदें

फ़ाज़िल जमीली

दरख़्तों के लिए

फ़ाज़िल जमीली

ज़िंदगानी को अदम-आबाद ले जाने लगा

फ़ाज़िल जमीली

सुख़न जो उस ने कहे थे गिरह से बाँध लिए

फ़ाज़िल जमीली

शौक़ीन मिज़ाजों के रंगीन तबीअ'त के

फ़ाज़िल जमीली

सफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है

फ़ाज़िल जमीली

मिसाल-ए-शम्अ जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ

फ़ाज़िल जमीली

मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते

फ़ाज़िल जमीली

मिरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया

फ़ाज़िल जमीली

मेरे होंटों पे तेरे नाम की लर्ज़िश तो नहीं

फ़ाज़िल जमीली

ख़्वाब में देख रहा हूँ कि हक़ीक़त में उसे

फ़ाज़िल जमीली

ख़ुमार-ए-शब में तिरा नाम लब पे आया क्यूँ

फ़ाज़िल जमीली

ख़िज़ाँ का रंग दरख़्तों पे आ के बैठ गया

फ़ाज़िल जमीली

कहीं से नीले कहीं से काले पड़े हुए हैं

फ़ाज़िल जमीली

हम ने किसी की याद में अक्सर शराब पी

फ़ाज़िल जमीली

गुज़रती है जो दिल पर वो कहानी याद रखता हूँ

फ़ाज़िल जमीली

अपने होने के जो आसार बनाने हैं मुझे

फ़ाज़िल जमीली

अब तो अश्कों की रवानी में न रक्खी जाए

फ़ाज़िल जमीली

ज़मज़मा-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ दूर तक

फ़ाज़िल अंसारी

ये दौर कैसा है या-इलाही कि दोस्त दुश्मन से कम नहीं है

फ़ाज़िल अंसारी

वो बर्क़ का हो कि मौजों के पेच-ओ-ताब का रंग

फ़ाज़िल अंसारी

तोहफ़ा-ए-ग़म भी मिला दर्द की सौग़ात के बा'द

फ़ाज़िल अंसारी

न सनम-कदों की है जुस्तुजू न ख़ुदा के घर की तलाश है

फ़ाज़िल अंसारी