Heart Broken Poetry (page 190)
है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी
बशीर ज़ैदी असीर
ज़ाहिर मिरी शिकस्त के आसार भी नहीं
बशीर सैफ़ी
किसे ख़बर है मैं दिल से कि जाँ से गुज़रूँगा
बशीर सैफ़ी
इस बहर-ए-बे-सदा में कुछ और नीचे जाएँ
बशीर सैफ़ी
हब्स के दिनों में भी घर से कब निकलते हैं
बशीर सैफ़ी
इक हुस्न-ए-बे-मिसाल के जो रू-ब-रू हूँ मैं
बशीर सैफ़ी
ऐसा लगता है मुख़ालिफ़ है ख़ुदाई मेरी
बशीर सैफ़ी
सुहाने सपने आए हैं
बशीर महताब
सब की मौजूदगी समझता है
बशीर महताब
रुख़ तुम्हारा हो जिधर हम भी उधर हो जाएँगे
बशीर महताब
न आने के उन के बहाने भी देखे
बशीर महताब
माना उस को गिला नहीं मुझ से
बशीर महताब
किस मस्ती में अब रहता हूँ
बशीर महताब
जब से मिरे रक़ीब का रस्ता बदल गया
बशीर महताब
इक लम्हा भी गुज़ारूँ भला क्यूँ किसी के साथ
बशीर महताब
चले जाना मगर सुन लो मिरे दिल में ये हसरत है
बशीर महताब
आज-कल के शबाब देखे हैं
बशीर महताब
अजब सी आग थी जलता रहा बदन सारा
बशीर फ़ारूक़ी
आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास
बशीर फ़ारूक़ी
शहर-ए-फ़स्ल-ए-गुल से चल कर पत्थरों के दरमियाँ
बशीर फ़ारूक़ी
मैं जितनी देर तिरी याद में उदास रहा
बशीर फ़ारूक़ी
लोगो हम छान चुके जा के समुंदर सारे
बशीर फ़ारूक़ी
अब के जुनूँ में लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं
बशीर फ़ारूक़ी
मिरी नमाज़ मिरी बंदगी मिरा ईमाँ
बशीर फ़ारूक़
वो सितम-परवर ब-चश्म अश्क-बार आ ही गया
बशीर फ़ारूक़
वो कभी शाख़-ए-गुल-ए-तर की तरह लगता है
बशीर फ़ारूक़
तख़लीक़-ए-काएनात दिगर कर सके तो कर
बशीर फ़ारूक़
सबा गुल-ए-रेज़ जाँ-परवर फ़ज़ा है
बशीर फ़ारूक़