Heart Broken Poetry (page 189)

उन का बर्बाद-ए-करम कहने के क़ाबिल हो गया

बासित भोपाली

शौक़ को बे-अदब किया इश्क़ को हौसला दिया

बासित भोपाली

सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए

बासित भोपाली

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

मोहब्बत की इंतिहा चाहता हूँ

बासित भोपाली

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

कुछ सिला ही न मिला इश्क़ में जल जाने का

बासित भोपाली

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

किसी के नक़्श-ए-क़दम का निशाँ नहीं मिलता

बासित भोपाली

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

तेरे दिए हुए दुख

बासिर सुल्तान काज़मी

कैसे याद रही तुझ को

बासिर सुल्तान काज़मी

गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी

बासिर सुल्तान काज़मी

था जो कभी इक शौक़-ए-फ़ुज़ूल

बासिर सुल्तान काज़मी

क़रार पाते हैं आख़िर हम अपनी अपनी जगह

बासिर सुल्तान काज़मी

कितना काम करेंगे

बासिर सुल्तान काज़मी

ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात

बासिर सुल्तान काज़मी

जिन दिनों ग़म ज़ियादा होता है

बासिर सुल्तान काज़मी

होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते

बासिर सुल्तान काज़मी

हज़ार कहता रहा मैं कि यार एक मिनट

बासिर सुल्तान काज़मी

हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं

बासिर सुल्तान काज़मी

दूर साया सा है क्या फूलों में

बासिर सुल्तान काज़मी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

बंधन सा इक बँधा था रग-ओ-पय से जिस्म में

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

लड़ ही जाए किसी निगार से आँख

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कौन कहता है नसीम-ए-सहरी आती है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी